भारत के मानचित्र पर सुशोभित है, त्रिदंडी स्वामी का आश्रम, रही है ऋषि मुनियों की कर्म स्थली:अयोध्या नाथ स्वामी

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रामराज सिंह बक्सर

बक्सर एक ऐतिहासिक जगह है जहां श्री रामचंद्र जी पधार चुके हैं। पवित्र गंगा के तट पर बसा बक्सर ऋषि मुनियों की जन्म और कर्म स्थली के रूप में सुशोभित है। जग जाहिर है विश्व प्रसिद्ध भारत के महान मनीषी सन्त जगदृवन्ध जगदाचार्य, श्रीमतविष्वक्सेनाचार्य श्री त्रिदंडी स्वामी के परम शिष्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज अधर्म पर धर्म की नई रेखाएं खींच पूरे जनमानस को भक्ति की राह दिखाई है।

संत महात्माओं की धरोहर जीयर स्वामी सैकड़ों विशाल यज्ञ कराकर अधर्म पर धर्म की विजय होने का परिचय दिए हैं ।आज स्वामी जी के शिष्य लाखों में हैं जो भक्ति के मार्ग पर प्रवचन से अपने जीवन में सुख शांति और समृद्धि जैसे असंभव रत्न को संम्भव किए हैं। धर्म के रखवाले और धरोहर यूं ही नहीं कहते कि दुनिया में कोई ऐसे हैं संत ऋषियों की मंडली जप-तप करके धर्म रक्षार्थ भक्ति में लीन है, जिनकी पुण्य प्रताप से धरती टिकी हुई है । इसलिए बक्सर धर्म की नगरी के रूप मे आपने हर धार्मिक संपदाओं से परिपूर्ण है।

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यह धर्म की नगरी को ज्ञान विज्ञान का तपोवन नहीं कहा गया है। महर्षि विश्वामित्र के तप-बल का ही प्रभाव था कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम व लक्ष्मण ने, वीरोचित शिक्षा ग्रहण करके राक्षसी वृत्तियों के ताडीका ,मारीच ,सुवाहु का संहार किया थे। ताकि देवता देवी का वास हो, ऋषि मुनियों का सम्राज्य कायम रहे। वेद शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों में बक्सर को महर्षि विश्वामित्र की जन्मस्थली तो नहीं बताया गया है, परंतु इस स्थल को उनका तपोभूमि जरूर कहा गया है। जीयर स्वामी के कृपा पात्र बने श्री अयोध्या नाथ स्वामी के अनुसार तपोस्थली के कारण नाम पड़ा सिद्धाश्रम
कहते हैं 88 हजार ऋषियों-मुनियों की तपोस्थली होने के कारण ही पूर्वकाल में बक्सर का नाम सिद्धाश्रम पड़ा।

बक्सर ही वह पुण्य भूमि है, जहां विश्व के प्रथम तत्वदर्शी, वैज्ञानिक, मंत्रद्रष्टा व सृष्टि के संस्थापक महर्षि विश्वामित्र ने अपना आश्रम बनाया था। इस बाबत साहित्यकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा बताते हैं कि महर्षि विश्वामित्र भारत की प्रचलित व्यवस्था के विरूद्ध क्रांतिकारी कदम उठाने वाले प्रथम व्यक्ति तो थे ही, उनके द्वारा स्थापित सिद्धाश्रम विश्व का पहला शैक्षणिक संस्थान भी था। उन्हीं के तपबल के प्रभाव से प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण को शस्त्रनीति, धर्मनीति, कर्मनीति का विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ। जहां दोनों भाइयों ने मिलकर राक्षसी वृत्ति का संहार करते हुए आदर्श मानवीय मूल्यों की रक्षार्थ के कीर्तिमान के रूप में रामराज्य की स्थापना की थी।कार्तिक शुक्लपक्ष तृतीया को हुआ था जन्म आगे संत विचार के अयोध्या स्वामी ने बताया कि शास्त्रों में राजा गाधि के पुत्र महर्षि विश्वामित्र का जन्म कार्तिक शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि में वर्णित है। खास बात यह है कि क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होते हुए भी राज्य-काज, संपदा व ऐश्वर्य से बढ़कर उन्होंने तप-बल को महत्व दिया। उन्होंने बताया कि धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख भी मिलता है। कि राज ऋषि होते हुए भी गुरूवर वशिष्ठ ने इन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि दी।

बक्सर इनका कार्य स्थल रहा है और यहीं वे जप-तप, यज्ञ, योग आदि किया करते थे। पर्यटन मानचित्र पर उपेक्षित क्यो महर्षि विश्वामित्र व भगवान श्रीराम से जुड़े होने के बावजूद बक्सर को पर्यटन मानचित्र पर अबतक नहीं लाया जा सका है। हालांकि, रामायण काल से जुड़े तथ्यों के आधार पर यहां कई परंपराओं का निर्वहन आज भी आस्था पूर्वक होता है। इनमें पंचकोश परिक्रमा व सिय-पिय मिलन समारोह आदि ऐसे भव्य धार्मिक आयोजन हैं, जिसमें देशभर के लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। परंतु, पर्यटन के मुताबिक सुविधाएं नहीं मिलने के कारण यहां केवल परंपरा निभाकर अपना भक्ती का इजहार कर के तुरंत वापस चले जाते हैं।

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