नवरात्रि में सिद्धपीठ आमी में उमर रहा भक्तों का जनसैलाव

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पन्नालाल कुमार की एक रिपोर्ट।

छपरा।

सिद्धपीठ आमी के अम्विका भवानी मंदिर में नवरात्रि के पावन अवसर पर भक्तों का जमावरा प्रातः तीन बजे से ही होने लगता है। माॅ का पट्ट खुलते ही जयकारा से मंदिर परिसर गुंजयमान हो रहा है । यहाॅ न सीर्फ पाठ करने वालो की भीड एकत्र हो रही है बल्कि अपने घर पर भी कलश स्थापित कर पाठ करने वाले माता अम्विका के दरबार में माथा टेकने अहले सुबह पहुॅच रहे। भक्तो का कहना है कि मैया सबको मनवांछित फल प्रदान करती है। मंदिर का पूजारी शिव कुमार  तिवारी उर्फ भोला बाबा ने बताया कि माता पार्वती का पहले शति के रूप मे अवतरण हुआ और भगवान भोलेनाथ के सांथ उनकी शादी हुई लेकिन जब उनके पिता दक्ष प्रजापति यज्ञ कर रहे थे तो उन्होंने भगवान शिव को निमंत्रण नही दिया। लेकिन माता बिना निमंत्रण के ही अपने पिता के यज्ञ स्थल पहुॅची। लेकिन अपने पति का आसन्न न पाकर दुःखी हो यज्ञ कुण्ड मे आत्मदाह कर ली थी। जिसके बाद भगवान विष्णु ने उनके शरीर को खंडित कर भगवान भोलेनाथ के क्रोध को शांत किया। वही शरीर का टुकरा जहां-जहां गिरा वह कलान्तर में शक्ति पीठ कहलाया और आमी जहाॅ मैया भष्म हुई वह स्थल सिद्ध पीठ कहलाया। सिद्धपीठ आमी  स्थित मैया के मिट्टी की वही पिण्डी है जो यज्ञ कुण्ड पर बना है ,भारत के सभी शक्तिपीठो मे प्रमुख है सिद्धपीठ आमी ।यहां सभी भक्तो का मनोरथ मैया पूर्ण करती है।

आमी के अम्विका मां का जिक्र मारकण्डेय पुराण मे भी मिलता है। जिसमें राजा सूरथ व समाधि वैश्य द्वारा गंगा तट के पास माॅ अम्विका के मिट्टी की पिण्डी बनाकर कठोर साधना का जिक्र मारकण्डेय मुनि द्वारा किया गया है। इसका विस्तार से चर्चा दुर्गा सप्तशती के पहले व तेरहवे अध्याय में है ।  राजा सुरथ व वैश्य के कठोर साधना की कहानी मार्कण्डेय मुनी ने दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों मे कुल 700 श्लोकों में की है । जिसका साक्ष्य मां अम्विका भवानी के मिट्टी के पिण्डी के सटे उत्तर दिशा मे गंगा कुण्ड से सिद्ध होता है। उस छोटे से गंगा कुण्ड में कभी गंगाजल कम नही होता।भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए उस जल कुण्ड में हाॅथ डालते है । दुर्गा सप्तशति के तेरहवे अध्याय के सातवें , आठवें व नवें श्लोक मे लिखा है “इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः।प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्।नर्विण्णोडतिममत्वेन राज्यापहरणेन च।जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने।संदर्शनार्थमम्म्बाया नदीपुलिनसंस्थितः।”

अर्थात मेधा मुनि के वचन सुनकर राजा सुरथ व समाधि वैश्य तत्काल नदि तट पर तपस्या को चले गये। मार्कण्डेय मुनि ने लिखा है कि नदी तट पर मिट्टी का पिण्डी बनाकर दोनो ने कठोर साधना की जिससे अम्विका देवी को प्रकट होकर मनोरथ पूर्ण होने का वरदान देना पड़ा। वहीं मिट्टी की पिण्डी आज संसार मे मनोरथ पूर्ण करने वाली पिण्डी के रूप मे बिहार राज्य के सारण जिले के आमी धाम मे गंगा तट पर स्थित है।

 

वहीं रात्री में माता का विशेष पूजन व श्रृंगार हो रहा है ,जिसका अद्भुत नजारा देखने व मैया के चरणो मे मत्था टेकने के लिए भक्तो का जन सैलाव उमर रहा है। बच्चा से लेकर वृद्ध तक मां के श्रृंगार का एक नजारा देखने के लिए संध्या काल से ही भक्त एकत्रित होने लगते है। मां को स्नान कराके विशेष श्रृंगार व पूजन के बाद आरती शुरू होता है। इसके बाद पट्ट को आम भक्तों के दर्शनार्थ खोल दिया जाता है। सभी भक्त दर्शन कर प्रसाद लेकर मां का जयकारा करते अपने घर लौटते है। विशेष पूजन व श्रृंगार कलशस्थापन् के दिन से शुरू है जो विजया दशमी तक चलेगा। सभी दिन अलग अलग श्रृंगार का दृश्य रहता है।

विजया दशमी को मां सिद्धदात्री का श्रृंगार जई से होगा। इसकी जानकारी हस्तरेखा विशेषज्ञ पटना के आचार्य श्री काशीनाथ मिश्र ने दी।

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siwan
Farbisganj
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