एसएनसीयू वार्ड में 85 प्रतिशत नवजातों का होता है सफल इलाज

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• सभी प्रकार की आधुनिक सुविधाएं है उपलब्ध
• इलाज के बाद 1 साल तक किया जाता है नियमित फॉलोअप
• दूसरे जिले के नवजात भी होते हों भर्ती

बिहार न्यूज लाइव टीम।

पटना/पूर्णियाँ।
सदर अस्पताल परिसर स्थित सिक न्यूबॉर्न केअर यूनिट (एसएनसीयू) में हर महीने लगभग 85 प्रतिशत नवजातों का सफलता से इलाज हो रहा है। इसमें अलग-अलग कारणों से भर्ती हुए नवजातों को न सिर्फ बेहतर इलाज मुहैया कराया है बल्कि उनका 1 वर्ष तक फालोअप भी किया जाता है।

इसके लिए वार्ड में मौजूद सभी एएनएम एवं स्वास्थ्य कर्मी मुस्तैदी से लगे रहते है।

सफल इलाज का आंकड़ा 85 प्रतिशत से ज्यादा–

अस्पताल प्रबंधक सिंपी कुमारी ने बताया एसएनसीयू वार्ड में प्रतिमाह 350 से 400 नवजात भर्ती किये जाते हैं। यहाँ सिर्फ पूर्णियाँ ही नहीं बल्कि आस-पास जिलों के नवजात शिशु भी आते हैं। इनमें से 85 प्रतिशत से भी ज्यादा नवजातों का सफल इलाज हुआ है। आंकड़ो के अनुसार दिसम्बर माह में 287 नवजात भर्ती हुए थे, जिसमें 72 सरकारी अस्पताल एवं 215 बाहर के अस्पतालों से थे। इनमें से 188 बाहर के एवं 63 सरकारी अस्पताल के बच्चों का इलाज सफलता से किया गया है। नवम्बर माह में कुल 384 एड्मिशन हुआ, जिसमें 289 बाहर के अस्पतालों से एवं 95 सरकारी अस्पताल के थे। इनमें 244 बाहरी एवं 82 सरकारी अस्पतालों के बच्चों का इलाज सफलता से हुआ। अक्टूबर में 431 बच्चे भर्ती हुए जिनमें 304 बाहर से एवं 127 सरकारी अस्पतालों से थे। जिसमें 250 बाहरी एवं 112 सरकारी अस्पतालों के बच्चों का इलाज सफलता से किया गया है। इन सभी आंकडो को अगर देखा जाए तो एसएनसीयू वार्ड में प्रतिमाह लगभग 85 प्रतिशत से भी ज्यादा बच्चों का इकाज़ यहाँ सफलता से किया गया है।

बर्थ एस्फिक्सिया से होती है सर्वाधिक नवजातों की मौत– 

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जिला सिविल सर्जन डॉ मधुसूदन प्रसाद ने कहा कि सर्वाधिक नवजातों की मौत का एक प्रमुख कारण बर्थ एस्फिक्सिया होता है। जन्म का पहला घंटा नवजात के लिए महत्वपूर्ण होता है। जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी से दम घुटने से बच्चे को गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। गंभीर हालातों में बच्चे की जान भी जा सकती है. जिसे चिकित्सकीय भाषा में बर्थ एस्फिक्सिया कहा जाता है। कुल नवजातों की मौतों में 23% मृत्यु सिर्फ बर्थ एस्फिक्सिया से होती है। जिले के एसएनसीयू वार्ड में दिसम्बर माह में 17, नवंबर में 36 और अक्टूबर में 37 नवजात शिशुओं के मौत का कारण बर्थ एस्फिक्सिया ही था। इसके अलावा मौत के प्रमुख कारणों में निमोनिया, समय से पूर्व जन्म, बहुत कम वजन के बच्चे का जन्म आदि है।

वार्ड में उपलब्ध है बेहतर व्यवस्था– 

जीएनएम मार्था हेम्ब्रम ने बताया वार्ड में नवजात शिशुओं के इलाज के लिए सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध है। जरूरी मशीनें एवं इलेक्ट्रॉनिकल की सभी सुविधाएं यहाँ के एसएनसीयू में उपलब्ध है। इस वजह से आसपास के जिले से भी बच्चों को यहाँ भेज जाता है। इसके अलावा नवजात शिशुओं को सभी प्रकार की दवाइयां भी यहां उपलब्ध कराई जाती है। उसमें से कुछ दवाएँ महंगी भी होती है जो निःशुल्क प्रदान करायी जाती है। अस्पताल से छूटते समय नवजात के माताओं को पोषण की जानकारी, साफ सफाई की जरूरतें इत्यादि की भी जानकारी दी जाती है।

एएनएम द्वारा किया जाता है नियमित फालोअप–

एसएनसीयू से घर गए नवजात शिशुओं को फालोअप के लिए भी बुलाया जाता है। 1 साल तक कुल 6 बार शिशुओं को फालोअप के लिए बुलाया जाता है‌। फालोअप के समय शिशु की जांच की जाती है व उनके माता-पिता को देखभाल की जानकारी दी जाती है।

नवजात के बेहतर स्वास्थ्य का ऐसे रखें ख्याल– 

• गृह प्रसव कभी नहीं करायें
• दाई या स्थानीय चिकित्सकों की राय पर प्रसव पूर्व गर्भवती माता को ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन नहीं दिलाएं
• जन्म के बाद शिशु के गर्भ नाल पर तेल या किसी भी तरल पदार्थ का इस्तेमाल नहीं करें
• गर्भनाल को सूखा रखें
• नवजात को गर्मी प्रदान करने के लिए केएमसी विधि द्वारा माँ की छाती से चिपकाकर रखें,
• कमरे में शुद्ध हवा आने दें
• 1 घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करायें।

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