सारण:-कई बागी व निर्दलीय के चलते दलीय अभ्यर्थियों की बढ़ी है वेचैनी

डॉ विद्या भूषण श्रीवास्तव

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निवर्तमान विधायक भी हो गए है बागी
त्रिकोणात्मक संघर्ष के दिख रहे है आसार

*संदर्भ:तरैया विधान सभा सीट*

डॉ. विद्या भूषण श्रीवास्तव
छपरा कार्यालय ।
दिग्गज नेताओं के बागी एवं निर्दलीय रूप से चुनावी मैदान में कूदने से तरैया विधान सभा क्षेत्र अन्य चुनावों की तुलना इस बार अलग दिखने लगा है।खास बात है कि राजद के निवर्तमान विधायक मुंद्रिका प्रसाद राय टिकट नहीं मिलने एवं बाहरी व्यक्ति को टिकट मिलने के चलते खासे नाराज है और अपनी नाराजगी का इजहार व्यक्त कर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे है वही जदयू के प्रांतीय नेता रहे शैलेन्द्र प्रताप सिंह भी बागी होकर भाग्य आजमा रहे है।जबकि सामाजिक प्रभाव के कारण सरोज कुमार गिरि एवं युवाओं के बीच अपनी लगातार उपस्थिति दर्ज कराने वाले युवराज सुधीर कुमार सिंह भी किसी न किसी रूप से निर्दलीय चुनाव लड़कर दोनों गठबंधनों ( एनडीए एवं महागठबंधन )को चर्चा करने को विवश कर दिए है।वैसे,इस बार बसपा,जाप,शिवसेना ने भी अपना उम्मीदवार खड़ा किया है।

कभी किसी जमाने मे इस सीट को सारण का चितौड़गढ़ माना जाता था मगर परिसीमन के बाद इसका अस्तित्व ही अलग हो गया । जातीय व भौगोलिक संरचना में भी बदलाव आया है।अब इसे राजपूत,यादव एवं अति पिछड़ा वर्ग क्षेत्र के रूप में जाना जाने लगा है और यही कारण है कि जातीय समीकरण की वजह से पुरानी या ताजातरीन मुद्दे भी गौण होते चले गए और इस बार भी कमोवेश यही स्थिति सामने परिलक्षित होने वाली है जैसा कि,कई मतदाता कहने से भी नही चूक रहे है।
यहाँ की मूल समस्या बाढ़ ,किसानी समस्या के साथ साथ बेरोजगारी,पलायन है।बुनियादी समस्या भी कम नही है।कोई कुटीर उद्योग तक नहीं है।आपराधिक घटनाएं भी कम नहीं है।अब तो नक्सली समस्या भी नहीं है तब भी इस क्षेत्र को विकास की रोशनी से क्यों दूर रखा गया ? यह सवाल आज भी तैर रहे है।केवल प्रत्येक चुनांव में आश्वासन ही मिलता रहा है।
*इतिहास की आईंना में*
आजादी के बाद से अब तक सम्पन्न हुए चुनांव पर केंद्रित किया जाय तो इस क्षेत्र से प्रायः सभी दलों का मौका मिला है।कांग्रेस पार्टी ने तीन बार 1952,1962,एवं 1980 में जीत दर्ज की है वही सोशलिस्ट पार्टी एवं इसके विचारधारा से जुड़े नेताओ को भी तीन बार 1957,1967,1972 के चुनांव में जन प्रतिनिधि बनने का गौरव हासिल है।जबकि,जनता पार्टी ने भी दो बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा दिया है। भाजपा को 1985 के चुनांव के लंबे अंतराल के बाद 2010 में सफलता मिला था जबकि 1990 एवं 1995 में जनता दल की जीत हुई थी ।इसी तरह राजद ने2000,अक्टूबर 2005 एवं 2015 में चुनावी पताका फहराया था हालांकि,लोजपा को मात्र फरवरी 2095 में जीत मिली थी इन सभी चुनावों में सबसे अधिक चार बार चुनाव जीतने का रिकार्ड राम दास राय को ही प्राप्त था मगर विगत 2 अगस्त 2010 को उनकी मृत्यु होने के बाद उनके भाई मुंद्रिका प्रसाद राय ने यहाँ की राजनीति में प्रवेश किये और 2015 के चुनांव में भाजपा के जनक सिंह को 47 प्रतिशत मत लेकर 20440 वोट से पराजित कर दिया जिसमें श्री राय को69012 एवं श्री सिंह को 48572 (33.7% )मत मिला था।
हालांकि , 2010 के चुनांव में भाजपा के जनक सिंह ने कांग्रेस केटरकेश्वर सिंह को 6970 वोट से हराया था जिसमे जनक सिंह को26374 एवं तारकेश्वर सिंह 19630 मत प्राप्त हुआ था।
*ये रहा मतदान प्रतिशत*
विगत विधान सभा चुनाव में यहाँ 51 .96 % मतदान हुआ था वही 2019 के लोक सभा चुनाव में 56 .36% मत पड़े थे जबकि 2014 के लोक सभा चुनाव में 50.96 प्रतिशत मतदान हुआ था।
तरैया प्रखण्ड के 13,इसुआपुर प्रखण्ड के 13 एवं पानापुर के 11 पंचायतों से घिरा सारण जिला के उत्तरी भाग में अवस्थित इस विधान सभा सीट पर इस बार काफी रोचक एवं कड़े मुकाबले होने की प्रबल संभावना है ।देखना है कि निवर्तमान विधायक एक निर्दलीय के रूप में बाजी मार सकते है या नहीं,अथवा दलीय एवं बागी अभ्यर्थियों के चक्रव्यूह में फंसते है यह तो आने वाला कल संकेत देगा फिलहाल,बाहरी एवं भीतरी के मकड़जाल में यहां की सीट फंस गया है जहां सभी उम्मीदवार एक से बढ़कर मतदाताओं के पास अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे है। किसको फायदा मिलेगा किसको नहीं ।मतदाताओं की मौन रूपी चुप्पी टूटने के बाद पता चलेगा।वैसे,सभी अभ्यर्थी जन सम्पर्क अभियान में लगे है।

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