प्रेम एवं सौहार्द का मिसाल है ‘ईद-उल फितर’ : डा. गौतम

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छपरा :रमजान माह की इबादतों और रोजे के बाद जलवा अफरोज हुआ ईद-उल फितर का त्योहार खुदा का इनाम है, मुसर्रतों का आगाज है, खुशखबरी की महक है, खुशियों का गुलदस्ता है, मुस्कुराहटों का मौसम है, रौनक का जश्न है। इसलिए ईद का चांद नजर आते ही माहौल में एक गजब का उल्लास छा जाता है।

उक्त बातें पी.एन. कॉलेज,परसा के प्राचार्य डॉ. पुष्पराज गौतम ने कही।
उन्होंने कहा कि ईद के दिन सिवइयों या शीर-खुरमे से मुंह मीठा करने के बाद छोटे-बड़े, अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन गले मिलते हैं तो चारों तरफ मोहब्बत ही मोहब्बत नजर आती है। एक पवित्र खुशी से दमकते सभी चेहरे इंसानियत का पैगाम माहौल में फैला देते हैं।
डॉ .गौतम ने यह भी कहा कि अल्लाह से दुआएं मांगते व रमजान के रोजे और इबादत की हिम्मत के लिए खुदा का शुक्र अदा करते हाथ हर तरफ दिखाई पड़ते हैं और यह उत्साह बयान करता है कि लो ईद आ गई।

राजनीति विज्ञान के प्रखर विद्वान डॉ. गौतम मानते है कि कुरआन के अनुसार पैगंबरे इस्लाम ने कहा है कि जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेरामों से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं, तो अल्लाह एक दिन अपने उक्त इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है।
इसलिए इस दिन को ईद कहते हैं और इसी बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल फितर का नाम देते हैं।रमजान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। इस पूरे माह में रोजे रखे जाते हैं। इस महीने के खत्म होते ही दसवां माह शव्वाल शुरू होता है। इस माह की पहली चांद रात ईद की चांद रात होती है। इस रात का इंतजार वर्ष भर खास वजह से होता है, क्योंकि इस रात को दिखने वाले चांद से ही इस्लाम के बड़े त्योहार ईद-उल फितर का ऐलान होता है।

इस तरह से यह चांद ईद का पैगाम लेकर आता है। इस चांद रात को अल्फा कहा जाता है।

रमजान माह के रोजे को एक फर्ज करार दिया गया है, ताकि इंसानों को भूख-प्यास का महत्व पता चले। भौतिक वासनाएं और लालच इंसान के वजूद से जुदा हो जाए और इंसान कुरआन के अनुसार अपने को ढाल लें।

इसलिए रमजान का महीना इंसान को अशरफ और आला बनाने का मौसम है। पर अगर कोई सिर्फ अल्लाह की ही इबादत करे और उसके बंदों से मोहब्बत करने व उनकी मदद करने से हाथ खींचे तो ऐसी इबादत को इस्लाम ने खारिज किया है। क्योंकि असल में इस्लाम का पैगाम है- अगर अल्लाह की सच्ची इबादत करनी है तो उसके सभी बंदों से प्यार करो और हमेशा सबके मददगार बनो।

यह इबादत ही सही इबादत है। यही नहीं, ईद की असल खुशी भी इसी में है।

इस तरह दें अपने दोस्तों और रिश्तेदार को ईद की बधाई- कोरोना वायरस के खतरे के बीच ईद का त्योहार घर पर मनाएं। न ही किसी के घर जाएं और न ही किसी से हाथ मिलाएं और गले मिलें। वहीं बिना मिले आप अपने दोस्त और रिश्तेदारों को ईद की बधाई दे सकते हैं। दरअसर आप ईद की बधाई देने के लिए उन्हें फोन कर सकते हैं या फिर वीडियो कॉल करें। इसके साथ ही आप एक साथ कई लोगों को वीडियो कॉल के जरिए एक दूसरे को जोड़ सकते हैं।
घर पर अदा करें नमाज- भारत सरकार और दुनिया भर के सबसे प्रमुख इस्लामिक संगठनों ने लोगों को घर पर ही नमाज अदा करने का निर्देश दिया है। जिससे लोग मस्जिदों में जमावड़ा न कर सकें। इससे काफी लोग दुखी हो सकते हैं, लेकिन इस मुश्किल परिस्थिति में यह जरूरी है। इस दौरान आप अपने परिवार के साथ मिलकर नमाज अदा करें।
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रोजे का महीना तैयारी और आत्मविश्लेषण का महीना था। उसके बाद ईद का दिन मानो एक नए प्रण और एक नई चेतना के साथ जीवन को शुरू करने का दिन है। रोज़ा अगर ठहराव था तो ईद उस ठहराव के बाद आगे की तरफ बढ़ना है।
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रोज़े में व्यक्ति दुनिया की चीजों से थोड़े समय के लिए कट जाता है। यहां तक कि वे अपनी प्राकृतिक जरूरतों पर भी पाबंदी लगता है। यह वास्तव में तैयारी का अंतराल है, जिसका सही उद्देश्य है कि व्यक्ति बाहर देखने के बजाए अपने अंतर्मन की तरफ धयान दे। वह अपने में ऐसे गुण पैदा करे, जो जीवन के संघर्ष के बीच उसके लिए जरूरी हैं, जिनके बिना वह समाज में अपनी भूमिका उपयोगी ढंग से नहीं निभा सकता। जैसे धैर्य रखना, अपनी सीमा का उलंघन न करना, नकरात्मक मानसिकता से स्वयं को बचाना। इसी नकारात्मकता को समाप्त करने का नाम रोज़ा है, जिसका पूरा महीना गुजारकर व्यक्ति दोबारा जीवन के मैदान में वापस आता है और ईद के त्योहार के रूप में वह अपने जीवन के इस नए दौर का शुभारंभ करता है।
ईद का दिन प्रत्येक रोजेदार के लिए नई जिंदगी की शुरुआत का दिन है। रोजे रखने से व्यक्ति के अंदर जो उत्कृष्ट गुण पैदा होते हैं, उसका परिणाम यह होता है कि वह ना सिर्फ अपने लिए बल्कि समाज के लिए भी पहले से बेहतर व्यक्ति बनने के प्रयास में जुट जाता है।
रोजे में व्यक्ति जैसे भूख-प्यास बर्दाश्त करता है, उसी प्रकार से उसे जीवन में घटने वाली अनुकूल परिस्तिथियों को भी बर्दाश्त करना होता है। रोजे में जैसे व्यक्ति अपने सोने और जागने के नित्यकर्म को बदलता है, उसी प्रकार वह व्यापक मानवीय हितों के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग करता है। जैसे रोज़े में वह अपनी इच्छाओं को रोकने पर राज़ी होता है, ऐसे ही रमजान के बाद वह समाज में अपने अधिकारों से ज्यादा अपनी ज़िम्मेदारियों पर नज़र रखने वाला बनने का प्रयास करता है।
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रोज़ा साल में एक महीने का मामला था तो ईद साल के ग्यारह महीनों का प्रतीक है। रोज़े में वह सब्र, उपासना और अपने ख़ुदा को स्मरण करने में व्यस्त था तो ईद अगले ग्यारह महीने में इन सबको कार्यान्वित करने का नाम है। रोज़ा अगर निजी स्तर पर जीवन की अनुभूति थी तो ईद सामूहिक स्तर पर जीवन में शामिल होना है। रोज़ा अगर स्वयं को ख़ुदा के नूर से जगमगाने का अंतराल था तो ईद मानो दुनिया में इस रौशनी को फैलाने का नाम है। रोज़ा जिस तरह सिर्फ भूख-प्यास नहीं उसी तरह ईद सिर्फ खेल तमाशे का नाम नहीं। दोनों के पीछे प्रत्यक्ष रूप से गहरी सार्थकता छिपी हुई है।

एक हदीस में आता है जब हज़रत मुहम्मद साहब शव्वाल के महीने का चांद देखते तो कहते ‘ए मेरे रब इस चांद को शांति का चांद बन दे।’ हज़रत मुहम्मद साहब का यह कथन ईद के असल भाव को दर्शाता है। ईद का असल मकसद इंसान में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना तो है ही परन्तु इसका बड़ा लक्ष्य एक शांतिमय समाज की स्थापना की तरफ अग्रसर होना है।

डॉ. विद्या भूषण श्रीवास्तव/छपरा

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