मौलाना अबुल कलाम आज़ाद-कृतित्व एवं व्यक्तित्व

अबुल कलाम का अर्थ है “बातचीत के भगवान”

49
संजय कुमार सुमन 

अबुल कलाम आजाद, स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिये हर सार्थक प्रयास किये।यह ना केवल एक राजनेता थे बल्कि यह एक लेखक थे। जिनको कविताएँ लिखने का शौक था। इसी के साथ वैज्ञानिक भी थे ।वे बहुत शौकीन किस्म के इंसान थे जिनको बहुत सारी चीजों मे रूचि थी और यह खाली समय मे उसे सीखने का प्रयास करते थे। सबसे बड़ी बात यह धर्म से मुस्लिम थे पर भारत के लिये जान देते थे।कभी यह अपना धर्म बीच मे नही लाये और यह कभी नही चाहते थे कि भारत के दो हिस्से हो और भारत पाकिस्तान अलग देश का रूप ले ।इसको रोकने के लिये इन्होंने हर संभव प्रयत्न किये पर असफल रहे।यह अपने देश के प्रति बहुत ही ईमानदार थे जिसका सबूत इन्होंने भारत को आजाद करा कर दिया था। भारत के प्रति इनके इन योगदान को कोई नही भूल सकता आज भी इतिहास के पन्नों पर गहरी स्याही से इनका नाम लिखा हुआ है ।मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का असली नाम अबुल कलाम ग़ुलाम मुहियुद्दीन था। वह मौलाना आज़ाद के नाम से प्रख्यात थे। मौलाना आज़ाद कई भाषाओँ जैसे अरबिक, इंग्लिश, उर्दू, हिंदी, पर्शियन और बंगाली में निपुण थे। मौलाना आज़ाद किसी भी मुद्दे पर बहस करने में बहुत निपुण जो उनके नाम से ही ज्ञात होता है – अबुल कलाम का अर्थ है “बातचीत के भगवान”। उन्होंने धर्म के एक संकीर्ण दृष्टिकोण से मुक्ति पाने के लिए अपना उपनाम “आज़ाद” रख लिया। मौलाना आज़ाद स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री बने। राष्ट्र के प्रति उनके अमूल्य योगदान के लिए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को मरणोपरांत 1992 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

व्यक्तिगत जीवन
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का में हुआ था। उनके परदादा बाबर के ज़माने में हेरात (अफ़ग़ानिस्तान का एक शहर) से भारत आये थे। आज़ाद एक पढ़े लिखे मुस्लिम विद्वानों या मौलाना वंश में जन्मे थे। उनकी माता अरब देश के शेख मोहम्मद ज़हर वत्री की पुत्री थीं और पिता मौलाना खैरुद्दीन अफगान मूल के एक बंगाली मुसलमान थे। खैरुद्दीन ने सिपाही विद्रोह के दौरान भारत छोड़ दिया और मक्का जाकर बस गए। 1890 में वह अपने परिवार के साथ कलकत्ता वापस आ गए।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

परिवार के रूढ़िवादी पृष्ठभूमि के कारण आज़ाद को परम्परागत इस्लामी शिक्षा का ही अनुसरण करना पड़ा। शुरुआत में उनके पिता ही उनके अध्यापक थे पर बाद में उनके क्षेत्र के प्रसिद्ध अध्यापक द्वारा उन्हें घर पर ही शिक्षा मिली। आज़ाद ने पहले अरबी और फ़ारसी सीखी और उसके बाद दर्शनशास्त्र, रेखागणित, गणित और बीजगणित की पढाई की। अंग्रेजी भाषा, दुनिया का इतिहास और राजनीति शाष्त्र उन्होंने स्वयं अध्यन कर के सीखा।

कैरियर
उन्होंने कई लेख लिखे और पवित्र कुरान की पुनः व्याख्या की। उनकी विद्वता ने उन्हें तक्लीक यानी परम्पराओं के अनुसरण का त्याग करना और तज्दीद यानी नवीनतम सिद्धांतो को अपनाने का निर्देश दिया। उन्होंने जमालुद्दीन अफगानी और अलीगढ के अखिल इस्लामी सिद्धांतो और सर सैय्यद अहमद खान के विचारो में अपनी रूचि बढ़ाई। अखिल इस्लामी भावना से ओतप्रोत होकर उन्होंने अफगानिस्तान, इराक, मिश्र, सीरिया और तुर्की का दौरा किया। वह इराक में निर्वासित क्रांतिकारियों से मिले जो ईरान में संवैधानिक सरकार की स्थापना के लिए लड़ रहे थे। मिश्र में उन्होंने शेख मुहम्मद अब्दुह और सईद पाशा और अरब देश के अन्य क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। उन्हें कांस्टेंटिनोपल में तुर्क युवाओं के आदर्शों और साहस का प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। इन सभी मुलाकातों ने उन्हें राष्ट्रवादी क्रांतिकारी में तब्दील कर दिया।

विदेश से लौटने पर आज़ाद ने बंगाल के दो प्रमुख क्रांतिकारियों अरविन्द घोष और श्री श्याम शुन्दर चक्रवर्ती से मुलाकात की और ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हो गए। आज़ाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों को बंगाल और बिहार तक ही सीमित पाया। दो सालों के अंदर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने पूरे उत्तर भारत और बम्बई में गुप्त क्रांतिकारी केन्द्रो की संरचना की। उस समय बहुत सारे क्रांतिकारी मुस्लिम विरोधी थे क्योंकि उन्हें लगता था कि ब्रिटिश सरकार मुस्लिम समाज का इस्तेमाल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के विरुद्ध कर रही है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपने सहयोगियों को समझाने की कोशिश।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

1912 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने मुसलमानों में देशभक्ति की भावना को बढ़ाने के लिए ‘अल हिलाल’ नामक एक साप्ताहिक उर्दू पत्रिका प्रारम्भ की। अल हिलाल ने मोर्ले मिंटो सुधारों के परिणाम स्वरुप दो समुदायों के बीच हुए मनमुटाव के बाद हिन्दू मुस्लिम एकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अल हिलाल गरम दल के विचारों को हवा देने का क्रांतिकारी मुखपत्र बन गया। 1914 में सरकार ने अल हिलाल को अलगाववादी विचारों को फ़ैलाने के कारण प्रतिबंधित कर दिया। मौलाना आज़ाद ने तब हिन्दू-मुस्लिम एकता पर आधारित भारतीय राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के उसी लक्ष्य के साथ एक और साप्ताहिक पत्रिका ‘अल बलाघ’ शुरू की। 1916 में सरकार ने इस पत्रिका पर भी प्रतिबंध लगा दिया और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को कलकत्ता से निष्कासित कर दिया और रांची में नजरबन्द कर दिया गया जहा से उन्हें 1920 के प्रथम विश्व युद्ध के बाद रिहा कर दिया गया ।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

रिहाई के पश्चात आज़ाद ने खिलाफत आंदोलन के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को जगाया। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य खलीफा को फिर से स्थापित करना था क्योंकि ब्रिटिश प्रमुख ने तुर्की पर कब्ज़ा कर लिया था। मौलाना आज़ाद ने गांधी जी द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और 1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रवेश किया। 1923 में उन्हें दिल्ली में कांग्रेस के एक विशेष सत्र के लिए अध्यक्ष चुना गया। मौलाना आज़ाद को गांधीजी के नमक सत्याग्रह का हिस्सा होने के कारण नमक कानून के उल्लंघन के लिए 1930 में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें डेढ साल के लिए मेरठ जेल में रखा गया। मौलाना आज़ाद 1940 में रामगढ अधिवेसन में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1946 तक उसी पद पर बने रहे। वह विभाजन के कट्टर विरोधी थे और उनका मानना था की सभी प्रांतो को उनके खुद के सविधान पर एक सार्वजनिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के साथ स्वतंत्र कर देना चाहिए। विभाजन ने उन्हें बहुत आहत किया और उनके संगठित राष्ट्र के सपने को चकना चूर कर दिया।

क्रांतिकारी और पत्रकार के रूप में

आजाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ थे। उन्हेंने अंग्रेजी सरकार को आम आदमी के शोषण के लिए जिम्मेवार ठहराया। उन्होंने अपने समय के मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की जो उनके अनुसार देश के हित के समक्ष साम्प्रदायिक हित को तरज़ीह दे रहे थे। अन्य मुस्लिम नेताओं से अलग उन्होने 1905 में बंगाल के विभाजन का विरोध किया और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अलगाववादी विचारधारा को खारिज़ कर दिया। उन्होंने ईरान, इराक़ मिस्र तथा सीरिया की यात्राएं की। आजाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरंभ किया और उन्हें श्री अरबिन्दो और श्यामसुन्हर चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों से समर्थन मिला।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

आज़ाद की शिक्षा उन्हे एक दफ़ातर (किरानी) बना सकती थी पर राजनीति के प्रति उनके झुकाव ने उन्हें पत्रकार बना दिया। उन्होने 1912 में एक उर्दू पत्रिका अल हिलाल का सूत्रपात किया। उनका उद्येश्य मुसलमान युवकों को क्रांतिकारी आन्दोलनों के प्रति उत्साहित करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना था। उन्होने कांग्रेसी नेताओं का विश्वास बंगाल, बिहार तथा बंबई में क्रांतिकारी गतिविधियों के गुप्त आयोजनों द्वारा जीता। उन्हें 1920 में राँची में जेल की सजा भुगतनी पड़ी।

असहयोग आन्दोलन

जेल से निकलने के बाद वे जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोधी नेताओं में से एक थे। इसके अलावा वे खिलाफ़त आन्दोलन के भी प्रमुख थे। खिलाफ़त तुर्की के उस्मानी साम्राज्य की प्रथम विश्वयुद्ध में हारने पर उनपर लगाए हर्जाने का विरोध करता था। उस समय ऑटोमन (उस्मानी तुर्क) मक्का पर काबिज़ थे और इस्लाम के खलीफ़ा वही थे। इसके कारण विश्वभर के मुस्लिमों में रोष था और भारत में यह खिलाफ़त आंन्दोलन के रूप में उभरा जिसमें उस्मानों को हराने वाले मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, इटली) के साम्राज्य का विरोध हुआ था।गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया।

स्वतंत्र भारत के शिक्षा मंत्री

वह स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे और उन्होंने ग्यारह वर्षो तक राष्ट्र की नीति का मार्गदर्शन किया।मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री के रूप में 1947 से 1958 तक देश की सेवा की। भारत के पहले शिक्षा मंत्री बनने पर उन्होंने नि:शुल्क शिक्षा, भारतीय शिक्षा पद्धति, उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना में अत्यधिक के साथ कार्य किया। मौलाना आज़ाद को ही ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान’ अर्थात् ‘आई.आई.टी. और ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना का श्रेय है।वे संपूर्ण भारत में 10+2+3 की समान शिक्षा संरचना के पक्षधर रहे।यदि मौलाना अबुल कलाम आज ज़िंदा होते तो वे नि:शुल्क शिक्षा के अधिकार विधेयक को संसद की स्वीकृति के लिए दी जाने वाली मंत्रिमंडलीय मंजूरी को देखकर बेहद प्रसन्न होते। शिक्षा का अधिकार विधेयक के अंतर्गत नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा एक मौलिक अधिकार है।   उन्होंने शिक्षा और संस्कृति को विकसित करने के लिए उत्कृष्ट संस्थानों की स्थापना की।

Image result for अब्दुल कलाम आजाद की जीवनी

साहित्यिक रचनाएं

मौलाना आजाद ने 1912 में अल-हिलाल नामक एक साप्ताहिक उर्दू पत्रिका का सूत्रपात किया था। किसी कारण वश वर्ष 1914 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, इसके बाद उन्होंने ’अल-बलाघ’’ नामक एक नई पत्रिका की शुरुआत की।अबुल कलाम की उल्लेखनीय रचनाओं में से ’गुबार ए खातिर’’ लेख उनके प्रसिद्ध लेखों में से एक है जिसे वर्ष 1942 और 1946 के बीच लिखा गया था।अबुल कलाम आजाद ने ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए और भारत के लिए स्व-शासन की हिमायत में कई रचनाओं को प्रकाशित किया। अबुल कलाम आजाद की भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित संपूर्ण पुस्तक का शीर्षक ’इंडिया विंस फ्रीडम’ वर्ष 1957 में प्रकाशित हुई थी।

अबुल कलाम आजाद की मृत्यु

 स्वतंत्रता संग्राम के एक बड़े नेता की मृत्यु 22 फरवरी, 1958 को देश की राजधानी नई दिल्ली मे हुई थी इनकी आकस्मिक मृत्यु हुई थी। इनकी मृत्यु से भारत को एक बड़ी क्षति हुई थे क्योंकि यह एक ऐसे मुस्लिम नेता थे जिन्होंने धर्म को मिलाने की कोशिश करी तथा हिन्दू-मुस्लीम एक है यह विचारधारा रख भारत को आजाद कराया।

(लेखक नेशनल जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव और ग्रेस इण्डिया टाइम्स बिहार संस्करण के सम्पादक हैं)

 

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

Farbisganj
siwan
Comments
Loading...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More