पीन्हबै पायल झनकौवा,ननद तोरो भाय ऐथौं हे, ……अनंत यात्रा पर चले गये भगवान प्रलय

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एस के झा की खास रिपोर्ट
सुलतानगंज: आंगिका के महाकवि गीतकर भगवान प्रलय का कटिहार जिले के कुरसेला प्रखंड के अन्तर्गत बलथी-महेशपुर गांव में अपने आवास पर शनिवार देर रात दो बजे के करीब हृदयघात के कारण निधन हो गया.

वे लगभग 71 वर्ष के थे. वे सैकड़ो अंगिका गीत के रचनाकार थे. उनके गीतों में कंगना रसें-रसें झुनुर-झुनुर बोले, सौन बरसै ते हमरो करम जरी जाय, पीन्हबै पायल झनकौवा, ननद तोरो भाय ऐथौं हे, कांटो गडै, गडे दहीं पांव रे, सांझ भेलौं लौटी चलें गांव रे, केकरा कहबै के पतियैतै अंगिया भेलै गुदरी, हो तीनरंगिया रंग में कहिया रंगैबै चुनरी, यहीं ठीहां डंफा झारी-झारी के बजाव रे.. जैसै सैकड़ों लोकप्रिय गीत अंगजनपद को दिया. उनके निधन से संपूर्ण बिहार और अंग प्रदेश मर्माहत है.

भगवान प्रलय का जन्म 15 अगस्त 1942 बल्थी महेशपुर,कटिहार मे हुआ था. पिता- स्व गोनर चौधरी व माता- स्व जिलेबा दाय थी. शिक्षा- दसवीं पास थे. उन्हे कवि रत्न, लोक भूषण, अंग प्रसून, अंग श्री,अंगीरथ, अजः रत्न, अंग पतंग,गीत कुल गौरव, गीतकार कुल शिरोमणि मिला है. सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन, नाट्य निर्देशन कर रहे थे.साहित्य विधा- गीत, कविता, नाटक,उपन्यास,प्रकाशित पुस्तक- गीत मेरे मीत (अंगिका गीत संग्रह),
अप्रकाशित पुस्तक- 1- कुमारी कौशिका (नाटक)2- महुआ घटबारिन (नाटक)3- महुआ घटबारिन (उपन्यास)4- महुआ घटबारिन (अंगिका लोक गाथा संग्रह)5- अंगिका गीत संग्रह,सम्पादन- सम्पादक मण्डल , अंगिकांचल पत्रिका,संस्थागत दायित्व-1-कार्यकारी अध्यक्ष,अखिल भारतीय अंगिका विकास समिति,2-सदस्य,सलाहकार समिति,सृजन समय,बहुद्देश्यीय सामाजिक संस्था,वर्धा,महाराष्ट्र थे.
– प्रतिनिधि कविता के बोल
1. कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै
दुनियां जैसें चलै तैसें डोलै

जहिया निदरदी पर पाप डिरियैलै
कंगना के झुनकी सें ताप छिरियैलै
झांसी में तेगा बजाय महारानी
हरदम बेधरमी केॅ तौलै
कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै . . . . . .

खनकै छै कंगना हीरामन के गाव में
अँचरा मलीन भेलै महुआ के छांव में
महुआ घटवारिन के लोग गीत गाय छै
जट्टा जटनियाँ के बिछुआ लगाय छै
हँसुला पिन्है हँसुला खोलै
कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै . . . . . .

विरहा में कजरी में ई खनखनाय छै
रसिया के पगड़ी में कखनू बन्हाय छै
कखनू झमाझम बाजै पनघट पर
मटखा पर मटका नाय डोलै
कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै . . . . . .

कंगना पिन्ही ममताँ दुनियाँ चलाय छै
तैय्यो कुलछनी अभागिन कहाय छै
रीत के बनैलको छै दक दक-समाज में
हाँसै कानै, नाँचै, डोलै
कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै . . . . . .

कंगना में गंगा के पानी बहै छै
लपका-पुरनका कहानी कहै छै
खाड़ी रहै छै हिमालय रं हिम बनी
जुग-जुग सें डगमग नाय डोलै
कंगना रसें रसें झुनुर झुनुर बोलै . . . . . .
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2. सावन बरसै ते हमरे करम जरी जाय
मोन ऐहने कहै कि ऊ घोर घूरी जाय

ऐलै सावन ते हमरो धरम टगै छै
दर-दर चुवै छै छप्पर शरम लागै छै
दोनों आँख हमरो डब-डब लोरो से भरी जाय
सावन बरसै ते हमरे करम जरी जाय . . . .

पानी ओसर्हौ पर ऐंगना में झोर परै छै
लागै दुखो सें सौंसे सरंग गरै छै
मेघ गरजै छै करिया ते कोय डरी जाय
सावन बरसै ते हमरे करम जरी जाय . . . .

अबकी ऐतै ते मनो के बात कहवै
करो खेथै में काम साथे साथ रहवै
सूनो घरो में डोर लागै आंग थरथराय
सावन बरसै ते हमरे करम जरी जाय . . . .

सॉझ परथै चिरैय्यो तॅ घोर आवै छै
आपनो खोता में कनियो टा सुख पावै छै
ऐन्हो कागतो के पैसा चूल्ही में जरी जाय
सावन बरसै ते हमरे करम जरी जाय . . .

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