छठ व्रत के प्रताप से धन्य-धान्य, आरोग्य और संतान सुख की होती है प्राप्ति

भगवान राम भी किया करते थे सूर्य की उपासना

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छठ पर्व विशेष- वैसे तो यह पर्व वर्ष भर में दो बार, एक कार्तिक मास और एक अभी यानी चैत्र मास में मनाया जाता है पर चैत्र मास के छठ का अपना एक विशेष महत्व है। कार्तिक मास में पडने वाले छठ में जहां मौसम व्रतियों के अनुकूल रहता है तो वहीं इस मास में कोई गुंजाइश नहीं रहती। तपन और गर्मी में भी प्रभु की कृपा से व्रती बिना अन्न-जल ग्रहण किए 24 घंटे के बाद ही पारण करते हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत चैत्र शुक्ल चतुर्थी से आरंभ होकर चैत्र शुक्ल सप्तमी तक चलती है।

इस दौरान 36 घंटे का व्रत रखा जाता है। घी से तला हुआ और सेंधा नमक डालकर कद्दू की सब्जी और अरवा चावल प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। दूसरे दिन खरना पूजा के साथ उपवास शुरू होता है। इस दिन व्रत करने के बाद शाम को सूर्यास्त के समय पूजा के बाद खीर का भोग लगाकर उसका प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

तीसरे दिन यानी षष्ठी को अस्त होते हुए सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य अर्पण करते हैं। अंत में सप्तमी के दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर चार दिनों की यह पूजा संपन्न होती है। इस व्रत का जिक्र पुराणों में भी मिलता है। पुराणों में बताया गया है कि चैत्र मास में भगवान सूर्य की पूजा विवस्वान नाम से करनी चाहिए। भविष्य पुराण के अनुसार भगवान राम सूर्य के वंशज माने जाते हैं।

क्योंकि उनका जन्म वैवस्वत मनु के पुत्र इच्छवाकु कुल में हुआ था। इसलिए भगवान श्री रामचंद्र जी अपने कुल पुरुष सूर्य देव की प्रसन्नता के लिए सूर्य और छठ का व्रत करते थे। महाभारत में कर्ण की उत्पत्ति भी भगवान सूर्य के आशीर्वाद से हुई थी। इस प्रकार वह भी सूर्य की उपासना कर अत्यंत ओजस्वी बन चुका था। पुराणों के अनुसार इस पूजा से धन-धान्य, आरोग्य और संतान सुख की प्राप्ति के साथ-साथ परलोक में भी विशिष्ट स्थान प्राप्त होता है।

रिपोर्ट:- रंजीत मिश्रा
पंचदेवरी (गोपालगंज)

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