कहीं हम बिरसा की शहादत को भूल तो नहीं गए

तीर की नोक से हिला डाली थी ब्रिटिश सरकार की नीव, भगवान के रूप में पूजे जाते हैं बिरसा मुंडा

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मंडा समाज में जन्मे बिरसा मुंडा का आज शहादत दिवस है। आज देश में कई जगह उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी जा रही है, पर शायद ही देश में उनके बलिदान को वह सम्मान मिले जो उस जमाने में चरखा छाप झंडा ढोने वाले को मिल रहा है। वैसे भी उन्हें सुभाष, चंद्रशेखर, भगत सिंह जैसे बागियों की श्रेणी में रखा गया है। तो चलिए जानते हैं जनजाति समाज में जन्में इस बागी क्रांतिकारी के विषय में?

आदिवासियों के महानायक बिरसा मुंडा का जन्म नवंबर ,1875 को झारखंड (बिहार) के सुगना – करमी मुंडा आदिवासी दंपत्ति के घर हुआ था। बिरसा मुंडा का बचपन यहां से वहां पलायन करने में ही बीता। इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा जयपाल नाग से प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए इन्होंने जर्मन मिशनरी स्कूल में नामांकन करवाया। जहां इनका धर्म परिवर्तन करवा दिया गया। हालांकि कुछ ही वर्षों बाद इन्होंने वह स्कूल छोड़ दिया। इसके पीछे का कारण यह था कि उस स्कूल में आदिवासी समाज एवं अन्य धर्मों का मजाक उड़ाया जाता था। जिसे वे बिल्कुल पसंद नहीं करते थे।

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स्कूल से निकलने के बाद बिरसा मुंडा के जीवन में उस वक्त बड़ा बदलाव आया जब उनकी मुलाकात स्वामी आनंद पांडेय से हुई। जिसके बाद वे हिंदू धर्म के अनुयाई हो गए। इन्होंने आनंद पांडे से अध्यात्म की शिक्षा ली। तत्पश्चात अपने समाज में फैले बहुत सारे अंधविश्वासों को दूर किया। सन् 1899 को ये अंग्रेजों के दमनकारी नीति के विरुद्ध खड़े हो गए। एक तरफ जहां अंग्रेज गोलियां दाग रहे थे। वहीं उसके जवाब में बिरसा अपने साथियों के साथ तीर की बौछार कर रहे थे। इस संघर्ष में बहुत सारे लोग मारे गए। इन्होंने कहा था कि “हम ब्रिटिश शासन तंत्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते हैं।

हम कभी भी ब्रिटिश हुकूमत के नियमों का पालन नहीं करेंगे। गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज– तुम्हारा हमारे देश में क्या काम है। भातर के कण-कण में हमारा अधिकर है। तुम इसे हमसे नहीं छीन सकते हो। इसलिए बेहतर है कि वापस अपने देश लौट जाओ वरना लाशों की लगा दिए जाएंगे।” अंत में अंग्रेजों ने साजिश के तहत इन्हें गिरफ्तार कर रांची के जेल में बंद कर दिया। जहां रहस्यमई तरीके से 9 जून 1990 की उनकी मौत हो गई। अपने 25 वर्ष की आयु में विरसा ने अपनी ऐसी पहचान बनाई कि बिहार झारखंड और उड़ीसा की आदिवासी जनता आज ही इन्हें भगवान के रूप में याद करती है।

आलेख:- रंजीत मिश्रा
पंचदेवरी (गोपालगंज)

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