डॉo संजय (हाजीपुर) – सदियों की परंपरा के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपक्ष पंचमी को अगस्त्य मुनि के तर्पण से पितृपक्ष आरंभ माना जाता है। इसके बाद के दिवस से अपने-अपने पितरों को उनके देहावसान की तिथि से लोग श्रद्धा पूर्वक तर्पण, श्राद्ध तथा सामर्थ्य के अनुरूप दान-पुण्य करते हैं।
कर्मकांड के अनुसार ऐसी भी मान्यता रही है कि अपने पितरों के निमित्त तर्पण करने से वे प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद सदैव बना रहता है।कहा भी गया है कि “देवता से पितर भारी’ ।
यह भी मान्यता रही है कि पितृ दोष से मुक्ति के लिए पितृ पक्ष में किये जानेवाले कृत्य यथा-तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य इत्यादि से पितरगण प्रसन्न हो जाते हैं । स्थानीय पौराणिक तथा ऐतिहासिक स्थल कौनहारा घाट जहां गजराज को ग्राह से उबारने के लिए श्री विष्णु स्वयं पधारे थे, शनिवार को इस स्थल पर बहुत से लोग इस दिवस पर पधारे और नारायणी में स्नान करके घाट पर उपस्थित पंडित के निर्देशानुसार विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ अगस्त्य मुनि को विशुद्ध मनोभाव से श्रद्धा पूर्वक तर्पण किया। यद्यपि सुबह से ही लगातार बारिश और तेज हवा बहती रही तथापि लोग आते रहे तथा अगस्त्य मुनि को तर्पण करते रहे।
पंचमी तिथि को अगस्त्य मुनि को किया गया यह तर्पण अपने पितरों के निमित्त किये जाने वाले तर्पण का संकल्प माना जाता है। दरअसल यह तर्पण कार्य अपने पूर्वजों के प्रति शरणापन्न भाव को दर्शाता है। बहुत से लोग ‘गया” जाकर अपने पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध तथा दान-पुण्य इत्यादि करते हैं और बहुत से लोग अपने-अपने घरों पर भी पंडित को आमंत्रित कर यह कृत्य करते हैं।
इस दिवस पर कौनहारा घाट पर उपस्थित युवा पंडित कन्हाई बाबा ने बताया कि मानव जीवन में अपने-अपने पितरों को प्रसन्न और तृप्ति के निमित्त यह तर्पण, श्राद्ध तथा दान-पुण्य इत्यादि अति महत्वपूर्ण कृत्य माना जाता है।इसे करने से पितरों की संतुष्टि, प्रसन्नता के साथ -साथ व्यक्ति को आत्मिक संतुष्टि होती है।इस अवधि में व्यक्ति अपने आचार, विचार तथा खान-पान से विशुद्धता बनाये रखता है और अपने-अपने पूर्वजों को स्मरण कर आदर भाव दर्शाता है।
