छपरा :बिहार के सारण जिले के अमनौर प्रखंड स्थित सलखुआ गांव के लिए यह अत्यंत गर्व का अवसर है कि यहाँ के लाल डॉ. शिवेंदु रंजन का चयन वर्ष 2026 बैच के लिए इंडियन नेशनल यंग एकेडमी ऑफ साइंस के सदस्य के रूप में किया गया है। यह प्रतिष्ठित उपलब्धि उनके वैज्ञानिक नेतृत्व, नवाचार क्षमता और समाज के प्रति विज्ञान को समर्पित प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है।
डॉ. शिवेंदु रंजन, अधिवक्ता रवि रंजन प्रसाद सिंह एवं शिक्षिका माधुरी सिंह के पुत्र हैं। वर्तमान में वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के स्कूल ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उनका शोध कार्य बायोमटेरियल, नैनोमेडिसिन और ट्रांसलेशनल नैनोटेक्नोलॉजी जैसे उन्नत और भविष्यपरक क्षेत्रों पर केंद्रित है, जिनका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से है।
आई एन वाई ए एस, इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी के मार्गदर्शन में कार्यरत भारत की आधिकारिक युवा विज्ञान अकादमी है। इसकी स्थापना वर्ष 2014 में प्रारंभिक करियर के वैज्ञानिकों को विज्ञान नीति, नेतृत्व और समाज से जुड़ने का मंच देने के उद्देश्य से की गई थी। प्रत्येक वर्ष देशभर से लगभग 20 उत्कृष्ट युवा वैज्ञानिकों को पाँच वर्षों के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। INYAS, ग्लोबल यंग एकेडमी से भी संबद्ध है और “भारत के युवा वैज्ञानिकों की आवाज” बनने की दिशा में कार्य करता है।
IIT खड़गपुर में डॉ. रंजन नैनो-बायो रिसर्च लैब का नेतृत्व करते हैं। यह एक बहुविषयक शोध समूह है, जहाँ बायोमेडिकल अनुप्रयोगों के लिए नैनोटेक्नोलॉजी के उपयोग पर अनुसंधान किया जाता है। उनकी लैब में जीन एवं इम्यून डिलीवरी, रीजेनरेटिव मेडिसिन, नैनो-बायो इंटरैक्शन, सस्टेनेबल नैनोटेक्नोलॉजी, नैनोसेंसर, क्वांटम सामग्री और नैनोफर्टिलाइज़र जैसे विषयों पर कार्य हो रहा है। उनका उद्देश्य प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को सीधे मरीजों और समाज तक पहुँचाना है।
डॉ. रंजन को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद तथा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार से महत्वपूर्ण अनुसंधान अनुदान प्राप्त हुए हैं। इनमें बायोएब्जॉर्बेबल ड्रग-एल्यूटिंग कार्डियोवैस्कुलर स्टेंट और गंभीर जलन के घावों के उपचार के लिए माइक्रोनीडल-हाइड्रोजेल पैच का विकास शामिल है। इसके अलावा, शिक्षा मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना के तहत वे अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के साथ भी सहयोग कर रहे हैं।
उनका शैक्षणिक योगदान भी अत्यंत प्रभावशाली है। उनके शोध पत्रों को देश-विदेश में व्यापक उद्धरण प्राप्त हुए हैं और वे CSIR प्रयोगशालाओं, विभिन्न IIT तथा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों के साथ सक्रिय सहयोग में हैं। वे स्प्रिंगर नेचर द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित जर्नलों Environmental Chemistry Letters और Discover Nano के एसोसिएट एडिटर भी हैं।
इनोवेशन के क्षेत्र में भी डॉ. रंजन का योगदान उल्लेखनीय है। वे नैनोफाइबर निर्माण के लिए हाई-थ्रूपुट इलेक्ट्रोस्पिनिंग नोज़ल के सह-आविष्कारक हैं और हाल ही में IIT खड़गपुर से एक्ने पैच, नैनोफर्टिलाइज़र, कार्बन क्वांटम डॉट्स तथा दवा की को-डिलीवरी तकनीक से जुड़े चार पेटेंट फाइल कर चुके हैं।
डॉ. शिवेंदु रंजन का आई एन वाई ए एस में चयन न केवल उनके परिवार और संस्थान के लिए, बल्कि पूरे बिहार और देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर भी वैश्विक स्तर पर विज्ञान और नवाचार में उत्कृष्ट योगदान दिया जा सकता है
