(हरिप्रसाद शर्मा) अजमेर: अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर अजमेर में मंगलवार को व्यापक जनआंदोलन देखने को मिला। अरावली बचाओ अभियान के तहत 12 से अधिक स्कूलों और कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के साथ विभिन्न सामाजिक, पर्यावरणीय और जनसंगठनों ने मिलकर रैली निकाली और कलेक्ट्रेट का घेराव किया। इस दौरान अरावली को बचाने की मांग को लेकर नारेबाजी की गई और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा गया।रैली की शुरुआत आजाद पार्क से हुई, जो शहर के विभिन्न मार्गों से होती हुई कलेक्ट्रेट परिसर पहुंची। हाथों में तख्तियां लिए छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने अरावली बचाओ, खनन बंद करो, प्रकृति बचाओ, भविष्य बचाओ जैसे नारे लगाए।
कलेक्ट्रेट पर पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने जिला कलेक्टर लोकबंधु के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम संयुक्त ज्ञापन सौंपा।ज्ञापन में अरावली पर्वतमाला के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई अरावली की नई परिभाषा को निरस्त करने की मांग की गई।
प्रदर्शनकारियों ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 20 नवंबर को दिए गए निर्णय में अरावली को परिभाषित करते हुए इसकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक और 500 मीटर विस्तार के दायरे में सीमित करने की बात कही गई है। वर्तमान में इस निर्णय पर भले ही रोक लगी हुई है लेकिन अरावली को सीमित करने का यह प्रयास पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है।प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि इस परिभाषा को लागू किया गया तो अरावली क्षेत्र के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से में खनन को प्रशासनिक स्वीकृति मिल सकती है।
इससे न केवल पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ेगा, बल्कि भूजल स्तर, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि अरावली पर्वतमाला की कुल 1281 पहाड़ियों में से केवल 1048 ही इस परिभाषा के अनुसार पहाड़ी मानी जाएंगी, जिससे शेष क्षेत्र खनन और अतिक्रमण के लिए खुला रह जाएगा।अरावली बचाओ अभियान से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि अरावली पर्वतमाला लाखों वर्षों से इस धरती पर विद्यमान है और यह उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन के लिए जीवनरेखा की तरह है।
उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार से अपील की कि अरावली की मूल भौगोलिक और ऐतिहासिक पहचान को ध्यान में रखते हुए इसके संरक्षण के लिए ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएं। वैसे तो प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि अरावली के संरक्षण को लेकर ठोस निर्णय नहीं लिए गए, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
