नगर परिषद खगड़िया में बड़ा प्रशासनिक घमासान! कार्यपालक पदाधिकारी के खिलाफ नगर सभापति अर्चना कुमारी सहित सशक्त स्थायी समिति और दर्जनों वार्ड पार्षदों ने खोला मोर्चा

Rakesh Gupta
- Sponsored Ads-

भ्रष्टाचार, गाली-गलौज और अमर्यादित भाषा के प्रयोग के गंभीर आरोप; बोर्ड बैठक का पत्र रिसीव नहीं करने की शिकायत, नगर सभापति को कार्यपालक पदाधिकारी के गेट पर चिपकाना पड़ा पत्र। महत्वपूर्ण संचिकाओं एवं प्रस्ताव पुस्तिका के गायब होने का आरोप, आगत-निर्गत पंजी को लेकर भी उठे सवाल। नगर सभापति द्वारा रिकॉर्ड मांगने पर दोपहर 3 बजे ही कार्यालय में ताला लगाकर कर्मचारियों के चले जाने की शिकायत।

खगड़िया। नगर परिषद खगड़िया में प्रशासनिक कार्यप्रणाली और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच विवाद अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। नगर परिषद की नगर सभापति श्रीमती अर्चना कुमारी के साथ सशक्त स्थायी समिति एवं दर्जनों वार्ड पार्षदों ने कार्यपालक पदाधिकारी की कार्यशैली के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। कार्यपालक पदाधिकारी पर भ्रष्टाचार से संबंधित गंभीर आरोप लगाने के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों के साथ गाली-गलौज, अमर्यादित भाषा और अपमानजनक व्यवहार करने के आरोप लगाए गए हैं।

- Sponsored Ads-

विवाद अब केवल जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारी के बीच आपसी मतभेद तक सीमित नहीं रह गया है। बोर्ड की बैठक से संबंधित आधिकारिक पत्र को रिसीव नहीं करने, महत्वपूर्ण सरकारी संचिकाओं एवं प्रस्ताव पुस्तिका की अनुपलब्धता, आगत-निर्गत पंजी को लेकर उठे सवाल और कार्यालय में कर्मचारियों के समय से पहले चले जाने की शिकायतों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

नगर सभापति अर्चना कुमारी के साथ सशक्त स्थायी समिति के सदस्य एवं वार्ड पार्षद शिवराज यादव, वार्ड पार्षद पप्पू यादव, रंजीत सिंह, ऋतुराज कुमार सहित दर्जनों जनप्रतिनिधियों ने कार्यपालक पदाधिकारी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। जनप्रतिनिधियों की नाराजगी से नगर परिषद की प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

बोर्ड बैठक का पत्र तक रिसीव नहीं किया गया, गेट पर चिपकाना पड़ा पत्र

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नगर सभापति अर्चना कुमारी द्वारा बोर्ड की बैठक आयोजित करने के लिए भेजे गए आधिकारिक पत्र को कार्यालय में रिसीव नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया है। जनप्रतिनिधियों के अनुसार, जब पत्र कार्यालय में स्वीकार नहीं किया गया तो अंततः नगर सभापति को कार्यपालक पदाधिकारी के गेट पर ही बैठक का पत्र चिपकाना पड़ा।

यह घटनाक्रम नगर परिषद की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। बोर्ड की बैठक नगर निकाय की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे में बैठक से संबंधित आधिकारिक पत्र को रिसीव नहीं करने की शिकायत बेहद गंभीर है।

जनप्रतिनिधियों का सवाल है कि जब नगर परिषद की निर्वाचित नगर सभापति के आधिकारिक पत्र को ही कार्यालय में स्वीकार नहीं किया जाएगा, तो आम नागरिकों और वार्ड पार्षदों के आवेदन एवं शिकायतों का क्या हाल होगा?

संचिकाओं और प्रस्ताव पुस्तिका के गायब होने का आरोप

इस पूरे विवाद में सबसे गंभीर मामला नगर परिषद की महत्वपूर्ण सरकारी संचिकाओं और प्रस्ताव पुस्तिका को लेकर सामने आया है। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि कार्यालय के कर्मचारियों के माध्यम से महत्वपूर्ण संचिकाएं और प्रस्ताव पुस्तिका गायब कर दी गई हैं।

बताया जा रहा है कि जब नगर सभापति अर्चना कुमारी ने संबंधित संचिकाओं एवं प्रस्ताव पुस्तिका की मांग की, तो उन्हें रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर जनप्रतिनिधियों की नाराजगी और बढ़ गई।

नगर परिषद की प्रस्ताव पुस्तिका में बोर्ड की बैठकों में लिए गए निर्णयों और प्रस्तावों का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड रहता है। इसी प्रकार सरकारी संचिकाओं में विभिन्न योजनाओं, प्रशासनिक आदेशों, स्वीकृतियों और वित्तीय कार्यों से संबंधित दस्तावेज मौजूद रहते हैं। ऐसे में इन अभिलेखों की अनुपलब्धता या उनके स्थान को लेकर अस्पष्टता बेहद गंभीर विषय है।

जनप्रतिनिधियों की मांग है कि सभी संचिकाओं और प्रस्ताव पुस्तिकाओं की तत्काल सूची तैयार कर उनकी भौतिक जांच कराई जाए। यह भी स्पष्ट किया जाए कि कौन-सा अभिलेख किस अधिकारी या कर्मचारी के पास है और उसे कार्यालय से बाहर ले जाने की अनुमति किसने दी है।

रिकॉर्ड मांगने पर दोपहर 3 बजे ही कार्यालय में ताला लगाकर चले गए कर्मचारी!

जनप्रतिनिधियों की ओर से एक और गंभीर शिकायत सामने आई है। आरोप है कि जब नगर सभापति ने कार्यालय में मौजूद महत्वपूर्ण संचिकाओं एवं प्रस्ताव पुस्तिका की मांग की, तो दोपहर लगभग 3 बजे ही सभी कर्मचारी अपने-अपने कार्यालय कक्ष में ताला लगाकर चले गए।

यदि यह शिकायत सही पाई जाती है, तो यह नगर परिषद की कार्यालय व्यवस्था और सरकारी अभिलेखों की उपलब्धता को लेकर गंभीर जांच का विषय है। आखिर नगर सभापति द्वारा सरकारी रिकॉर्ड की मांग किए जाने के बाद कार्यालय में ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? कर्मचारियों के कार्यालय बंद करके चले जाने के पीछे क्या कारण था? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।

आगत-निर्गत पंजी को लेकर भी गंभीर सवाल

जनप्रतिनिधियों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि कार्यपालक पदाधिकारी आगत-निर्गत पंजी अपने साथ लेकर चले गए हैं। आगत-निर्गत पंजी किसी भी सरकारी कार्यालय में प्राप्त और निर्गत होने वाले पत्रों का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड होता है।

ऐसे में इस पंजी की अनुपलब्धता से सरकारी पत्राचार और कार्यालय की प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जनप्रतिनिधियों ने आशंका जताई है कि कार्यालय समय के बाद बैकडेट में संचिकाओं या अभिलेखों में बदलाव अथवा छेड़छाड़ की कोशिश की जा सकती है।
हालांकि इस आशंका की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड की सुरक्षा को देखते हुए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मांग की जा रही है कि आगत-निर्गत पंजी सहित सभी महत्वपूर्ण अभिलेखों को तत्काल सुरक्षित कराया जाए तथा उनकी वर्तमान स्थिति का सत्यापन किया जाए। आवश्यकता पड़ने पर रिकॉर्ड का डिजिटल बैकअप भी तैयार कराया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की अनधिकृत छेड़छाड़ की संभावना को रोका जा सके।

कार्यपालक पदाधिकारी पर गाली-गलौज और अमर्यादित व्यवहार के आरोप

नगर सभापति अर्चना कुमारी के साथ सशक्त स्थायी समिति और दर्जनों वार्ड पार्षदों ने कार्यपालक पदाधिकारी के व्यवहार पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि उनके साथ कई मौकों पर गाली-गलौज एवं अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया गया।

जनप्रतिनिधियों का कहना है कि वे जनता के बीच से निर्वाचित होकर आते हैं और वार्ड की समस्याओं, विकास योजनाओं तथा आम नागरिकों की शिकायतों को लेकर अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखते हैं। ऐसे में उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए।

नगर परिषद में नगर सभापति, उपसभापति, सशक्त स्थायी समिति और वार्ड पार्षदों की अपनी लोकतांत्रिक एवं प्रशासनिक भूमिका है। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी सम्मान तथा बेहतर समन्वय के बिना नगर का विकास सुचारु रूप से संभव नहीं है।

भ्रष्टाचार के आरोपों ने बढ़ाई मामले की गंभीरता

कार्यपालक पदाधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार से संबंधित आरोप भी लगाए गए हैं। जनप्रतिनिधियों ने नगर परिषद की कार्यप्रणाली, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन, प्रशासनिक निर्णयों और कार्यालय में जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए हैं।

उनका कहना है कि नगर परिषद में जनता की गाढ़ी कमाई से विकास योजनाएं संचालित होती हैं। इसलिए प्रत्येक योजना में पारदर्शिता, गुणवत्ता और निर्धारित नियमों का पालन अनिवार्य है। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता की शिकायत सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

जनप्रतिनिधियों की मांग है कि कार्यपालक पदाधिकारी के विरुद्ध लगाए गए भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों की सक्षम स्तर से जांच कराई जाए और जांच में आरोप प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

नगर परिषद किसी अधिकारी की निजी जागीर नहीं, जनता की संस्था है

जनप्रतिनिधियों का कहना है कि नगर परिषद खगड़िया जनता की संस्था है। यहां प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक प्रस्ताव और प्रत्येक सरकारी अभिलेख का अपना महत्व है। नगर परिषद का संचालन कानून, नियम और निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।

नगर सभापति और वार्ड पार्षदों की जिम्मेदारी जनता के प्रति है। वहीं प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी नियमों के अनुरूप योजनाओं का क्रियान्वयन और नगर निकाय का सुचारु संचालन सुनिश्चित करना है। दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने से इसका सीधा असर आम नागरिकों और विकास कार्यों पर पड़ सकता है।

जिला प्रशासन एवं नगर विकास विभाग से उच्चस्तरीय जांच की मांग

इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिला प्रशासन और नगर विकास एवं आवास विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। जनप्रतिनिधियों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

विशेष रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर जांच की मांग उठ रही है—

  1. नगर सभापति द्वारा भेजे गए बोर्ड बैठक के पत्र को रिसीव क्यों नहीं किया गया?
  2. नगर परिषद की महत्वपूर्ण संचिकाएं और प्रस्ताव पुस्तिका कहां हैं?
  3. आगत-निर्गत पंजी किसके पास है और उसे कार्यालय से बाहर ले जाने का क्या आधार है?
  4. नगर सभापति द्वारा सरकारी रिकॉर्ड मांगने पर कर्मचारी दोपहर 3 बजे ही कार्यालय बंद करके क्यों चले गए?
  5. क्या किसी सरकारी संचिका या अभिलेख में अनधिकृत बदलाव अथवा छेड़छाड़ हुई है?
  6. कार्यपालक पदाधिकारी के विरुद्ध लगाए गए भ्रष्टाचार और अमर्यादित व्यवहार के आरोपों की जांच कब होगी?

जनप्रतिनिधियों की मांग है कि सभी महत्वपूर्ण सरकारी अभिलेखों को तत्काल सुरक्षित कराया जाए, उनकी सूची तैयार हो और उनकी वर्तमान स्थिति का सत्यापन किया जाए। साथ ही संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच हो।

अब बड़ा सवाल—नगर परिषद खगड़िया में आखिर चल क्या रहा है?

जब नगर सभापति के आधिकारिक पत्र को रिसीव नहीं करने की शिकायत सामने आए, सरकारी संचिकाओं एवं प्रस्ताव पुस्तिका की उपलब्धता पर सवाल उठें, आगत-निर्गत पंजी को लेकर विवाद हो और रिकॉर्ड मांगने पर कार्यालय में ताला लगाकर कर्मचारियों के चले जाने का आरोप लगे, तो प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या नगर परिषद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा है? क्या सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा सुनिश्चित है? क्या बोर्ड की बैठक और उसके प्रस्तावों से संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित हैं? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन शिकायतों पर जिला प्रशासन कब संज्ञान लेगा?

नगर परिषद खगड़िया में अब मामला केवल अधिकारी और जनप्रतिनिधियों के बीच विवाद का नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सम्मान का बन गया है।
जनता की अपेक्षा है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, सरकारी रिकॉर्ड सुरक्षित रहें, आरोपों की सच्चाई सामने आए और नगर परिषद का कामकाज विवादों से मुक्त होकर जनहित एवं विकास के रास्ते पर आगे बढ़े।

- Sponsored Ads-
Share This Article
Leave a Comment