भारतीय दर्शन चार और आचार के बीच संबंध स्थापित करता है ,राज्यपाल जीपीयू में अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वे अधिवेशन का हुआ उद्घाटन

Rakesh Gupta
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छपरा सदर। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन का भव्य उद्घाटन सोमवार को जीपीयू, छपरा में माननीय राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सय्यद अता हसनैन द्वारा किया गया। बताते चले कि 23 से 25 मार्च 2026 तक आयोजित हो रहे इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का केंद्रीय विषय “चराचर संवेदी एकात्मता: भारतीय जीवन दर्शन” है। उद्घाटन सत्र अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ, जिसमें देश के विभिन्न भागों से आए विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही और पूरा परिसर दार्शनिक चिंतन एवं विमर्श से गुंजायमान हो उठा।

मंचासीन गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। स्वागत के क्रम में माननीय कुलाधिपति महोदय का स्वागत कुलपति डॉ परमेंद्र कुमार बाजपेई ने किया। कुलपति का स्वागत प्रो. सुशील कुमार श्रीवास्तव ने, अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के सभापति प्रो. अमरनाथ झा का स्वागत कुलसचिव प्रो. नारायण दास , अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा का स्वागत प्रो. हरिश्चंद ने किया। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के सचिव प्रो. किस्मत कुमार सिंह का स्वागत प्रो. विश्वामित्र पाण्डेय ने किया।*राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

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राज्यपाल*अपने उद्घाटन अभिभाषण में माननीय कुलाधिपति महोदय ने भारतीय दर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों को बौद्धिक योद्धा बताते हुए ज्ञान, विवेक और नैतिकता के संतुलन पर विशेष बल दिया। उन्होंने “चराचर संवेदी एकात्मता” की अवधारणा को वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए कहा कि भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चर और अचर के बीच संबंध स्थापित करता है और समस्त सृष्टि को एकात्म दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है। आधुनिक विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भी उन्होंने भारतीय चिंतन की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों का संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अधिवेशन समाज, राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के लिए लाभकारी सिद्ध होगा तथा सभी प्रतिभागियों को अपनी शुभकामनाएँ दीं।

कुलाधिपति महोदय ने तीन नए भवनों और गैलरी का भी उद्घाटन किया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) परमेंद्र कुमार बाजपेई जी ने अपने गरिमामय स्वागत भाषण में माननीय कुलाधिपति और सभी अतिथियों व प्रतिभागियों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए इस अधिवेशन को विश्वविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण अवसर बताया। उन्होंने विश्वविद्यालय में चल रहे विकास कार्यों और शैक्षणिक सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थान निरंतर अधोसंरचना विकास, नए भवनों के निर्माण तथा शैक्षणिक गुणवत्ता के उन्नयन की दिशा में अग्रसर है। उन्होंने परीक्षा प्रणाली में सुधार, नामांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी एवं सुगम बनाने, ऑनलाइन प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने तथा छात्र सहायता केंद्र की स्थापना जैसे महत्वपूर्ण कदमों की चर्चा की। साथ ही उन्होंने पीएम उषा योजना और डीएसटी-फिस्ट कार्यक्रम के माध्यम से शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों को सुदृढ़ करने के प्रयासों को रेखांकित किया। कुलपति ने प्रशिक्षण एवं प्लेसमेंट को सशक्त बनाने, व्यावसायिक एवं रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के विस्तार तथा “वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन” जैसी पहल के माध्यम से विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण संसाधन उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। विभिन्न संस्थानों के साथ हुए समझौता ज्ञापनों एम ओ यू का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इनसे शैक्षणिक सहयोग को नई दिशा मिलेगी और अंततः गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य साकार होगा।

अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा जी ने विषय प्रवेश करते हुए “चराचर संवेदी एकात्मता” की दार्शनिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया और अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के इतिहास, उसके विकास तथा बढ़ती सदस्य संख्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इस प्रकार के अधिवेशन ज्ञान परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उद्घाटन सत्र में परिषद् के सभापति प्रो. अमरनाथ झा , सचिव प्रो. किस्मत कुमार सिंह सहित अन्य गणमान्य विद्वान मंचासीन रहे और उन्होंने भी भारतीय दर्शन की समग्र एवं जीवनोपयोगी दृष्टि की सराहना की। आयोजन सचिव प्रो. सुशील कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि यह अधिवेशन 25 मार्च 2026 तक विभिन्न अकादमिक सत्रों के माध्यम से विषय के विविध आयामों पर गहन चर्चा के साथ आगे बढ़ेगा। समापन सत्र में तीन दिनों के विमर्श का सार प्रस्तुत किया जाएगा और भावी दिशा निर्धारित की जाएगी। विश्वविद्यालय आयोजन सचिव प्रो. हरिश्चंद ने विश्वास व्यक्त किया कि यह अधिवेशन भारतीय दर्शन के अध्ययन एवं अनुसंधान को नई दिशा प्रदान करेगा तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित करेगा। मंच संचालन डॉ. ऋचा मिश्रा ने किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक, शिक्षेत्तर कर्मी, शोधार्थी उपस्थित थे।

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