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सारण: सारण में मनाई गई परमहंस दयाल जी महाराज समाधि स्मृति सभा

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Bihar News Live Desk : *महत्वपूर्ण संमाचार*

सारण में मनाई गई परमहंस दयाल जी महाराज समाधि स्मृति सभा

 

समाधि दिवस पर जुटे देश विदेश के संत एवं वक्ता 

 

अद्वैत दर्शन का हिंदुस्तान के बाहर भी जाकर स्थापित करने का श्रेय परमहंस दयाल जी को ही जाता है

 

फोटो 07,08 ,09 मंचासीन अतिथि एवं स्वामीगण, सभा में उपस्थित एवं पदयात्रा में शामिल अनुयायीगण

 

छपरा सदर। परमहंस दयाल जी महाराज समाधि स्मृति सभा में जीवनी एवं कार्य पर व्याख्यान देते हुए गरवा घाट के भक्त मंगल कवि ने बताया कि श्री श्री 1008 श्री परमहंस दयाल जी महाराज के अनुयायी हिंदू एवं मुस्लिम तथा सिख सभी थे।उनकी समाधि पाकिस्तान के टेरी में है।

वही मुंबई से आए अमेरिकन बैंक के डायरेक्टर संजय कुमार सिंह ने कहा कि परमहंस दयाल जी ने आध्यात्मिक एवं कर्मकांड में समन्वय स्थापित किया तथा दोनों धाराओं को मिलाया। उन्होंने यह भी कहा कि सबसे ऊपर गुरु होते हैं उनकी जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि उनकी जीवनी को चार भागों में विभाजित किया जाता है। जिसमें जन्म से 17 वर्ष तक छपरा में रहे। सन्यासी बनने के बाद 15 वर्ष तक आध्यात्मिक अनुभव से गुजरे। तीसरा खंड 20 से 22 वर्ष जयपुर में लोगों का कल्याण किया तथा चौथा काल पाकिस्तान का टेरी रहा, जहां 1902 से 1919 में समाधि लेने तक उन्होंने जाति, भाषा, धर्म, संप्रदाय को मिटाते हुए सबको एक बनाया।

   वहीं पूर्व आईएएस उदय कुमार ने बताया कि परमहंस दयाल जी महाराज के समय में कर्मकांड एवं समाज में विद्वेष थे परमहंस दयाल जी कर्मकांड में भक्ति के मार्गों के बीच का रास्ता दिखाएं जो हर्ष की बात है ।

   अमेरिका से आए वैभव कुमार सिंह ने कहा कि परमहंस दयाल जी को कुछ भी बोलना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है।

 

      वही जयप्रकाश विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रखर वक्ता डॉ लाल बाबू यादव ने परमहंस दयाल जी के जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतने बड़े संत की जन्म भूमि की जब खोज की गई तो वह छपरा के दहियावां मोहल्ला निकला। जहां आज इनकी मंदिर भी स्थापित कर दी गई है। उन्होंने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि भारत की सभ्यता का केंद्र नदियों के किनारे ही हुआ है तथा यहां ज्यादातर संतों का जन्म भी नदी किनारे ही हुआ है। छपरा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां पर तीन नदियों का मेल डोरीगंज में है और नदियों के कछार पर संतों का जन्म हुआ है लेकिन हम लोगों ने बाद में पहचान। विवेकानंद ने यह बात कहा था कि मुझे ज्यादा अभ्युदयानंद जानते हैं। डॉ यादव ने बताया कि सारण बहुत बड़े-बड़े संतों की जन्म और कर्मभूमि रही है। उन्होंने यह भी बताया कि यहीं पर स्वामी परमहंस दयाल जी के मंदिर के थोड़े पीछे दधीचि मंदिर है यह वही मंदिर है जो दधीचि ऋषि अपने हड्डी का दान देवताओं को कर दिए थे आमजन के कल्याण के लिए। हम लोग को गर्व होना चाहिए कि अपने छपरा के व्यक्ति अध्यात्म की दुनिया का सबसे बड़ा व्यक्ति साबित हुआ तथा वे पाकिस्तान के टेरी तक गए। 1846 में जन्मे परमहंस दयाल जी अद्वैत दर्शन के पक्षधर थे और आज भारतीय दर्शन से अद्वैत भारत के दर्शन का रीढ़ है। इस्लाम भी एक केश्वरवाद का समर्थन करता है। परमहंस दयाल जी महात्माओं और मुसलमानों को एकत्रित किए। डॉ कहा कि यदि युद्धों पर ध्यान दिया जाए तो आज तक 12000 युद्ध हुए हैं और हमारे यहां का दर्शन में प्रेम एवं एकता तथा समन्वय की धारा बहता है। यह दर्शन हिंदुस्तान ही नहीं हिंदुस्तान के बाहर भी जाकर स्थापित करने का श्रेय परमहंस दयाल जी को ही जाता है। वर्धमान विश्वविद्यालय कोलकाता के प्रोफेसर रंजीत कुमार ने कहा कि कलयुग में हम जीवो की कल्याण के लिए परमहंस दयाल जी ने छपरा के ज्ञान से पूरी दुनिया का उद्धार हो रहा है।

 

बताते चले कि छपरा में जन्में महान संत परमहंस दयाल श्री श्री 1008 श्री अद्वैतानंद जी महाराज परमहंस की समाधि दिवस के उपलक्ष्य में परमहंस दयाल समाधि स्मृति पदयात्रा का आयोजन 9 जुलाई को हुआ जो आयोजन का छठा वर्ष है। आयोजन परमहंस दयाल जी के परंपरा के पंचम पादशाही श्री श्री 108 श्री सत्यानंद जी महाराज परमहंस करते हैं जिसकी शुरूआत वर्ष 2019 में परमहंस दयाल जी की समाधि के शताब्दी वर्ष से शुरू हुई थी। पदयात्रा की शुरूआत सुबह 5 बजे ब्रह्म विद्यालय एवं आश्रम, नंदपुर (माँझी) परमहंस दयाल जी के ननिहाल से हुई। छपरा स्थित राजेंद्र स्टेडियम में परमहंस दयाल जी के जीवन एवं कार्यों पर विशेष व्याख्यान एवं प्रवचन का अनेकों संन्यासी-महात्मा तथा देश-विदेश के गणमान्य विद्वान ने प्रकाश डाला।

देश विदेश से आए संतों और वक्ताओ ने दावा किया कि पिछले पांच हजार

 

वर्षों में परमहंस दयाल जी महाराज के अलावा सारण का कोई दूसरा ख्यातिप्राप्त संत नही हुआ

 

जिनके अनुयायियों की संख्या विश्व स्तर पर करोड़ों में रही हो। उन्होंने कहा कि परमहंस दयाल जी महाराज की तपस्या तथा आदर्शों का गुणगान विश्व के 92 देशों में हो रहा है। उन्ही संत की जन्मस्थली सारण के लोगों ने उन्हें आज तक पूरी तरह नही जाना। सारण के लोगों के लिए।इससे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो

सकती है।

 

बताते चले कि राजेंद्र स्टेडियम जो समाधि स्मृति सभा के आयोजन का मुख्य स्थल था, वहां पर वक्ताओं के द्वारा परमहंस दयाल जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालने के बाद राजेंद्र स्टेडियम से ब्रह्म विद्यालय एवं आश्रम रौजा छपरा तक आए हुए संतो एवं अनुयायियों के द्वारा पद यात्रा की गई।

 गौरतलब है कि इस कार्यक्रम के आयोजन ब्रह्म विद्यालय एवं आश्रम रौजा छपरा के द्वारा किया गया था।

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