दर्शन केवल सैद्धांतिक विषय न होकर जीवन के व्यवहारिक पक्ष को दिशा प्रदान करता है। कुलपति
अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें अधिवेशन का समापन समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ
छपरा :दर्शन केवल सैद्धांतिक विषय न होकर जीवन के व्यवहारिक पक्ष को दिशा प्रदान करता है । उक्त बाते जे पी यू के कुलपति प्रो परमेंद्र कुमार बाजपेई ने जे पी यू में चल रहे अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70 वे अधिवेश के समापन के अवसर पर बुधवार को कही।
अधिवेशन के तीसरे दिन दो संगोष्ठी के साथ अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें अधिवेशन का समापन समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। समापन समारोह की अध्यक्षता जे पी यू के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेई ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव,मगध विश्वविद्यालय के कुलपति सारस्वत अतिथि प्रो. शशि प्रताप शाही व प्रो. लक्ष्मी निवास पांडे कुलपति, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा थे। मंचासीन अतिथियों में अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा, अधिवेशन के सभापति प्रो. अमरनाथ झा , सचिव प्रो. किस्मत कुमार सिंह और दार्शनिक त्रैमासिक के संपादक प्रो. शैलेश कुमार सिंह थे। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। अखिल भारतीय दर्शन परिषद् द्वारा जय प्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति के कुशल नेतृत्व में सफल आयोजन, उनकी कर्मठता और सदविचार की सराहना की गई। साथ ही विश्वविद्यालय तथा आयोजन सचिव द्वय प्रो. सुशील कुमार श्रीवास्तव और प्रो. हरिश्चंद को सम्मानित किया गया।
समापन समारोह की अध्यक्षता कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेई ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने दर्शन के समकालीन संदर्भों पर प्रकाश डालते हुए इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया और कहा कि दर्शन केवल सैद्धांतिक विषय न होकर जीवन के व्यवहारिक पक्ष को दिशा प्रदान करता है।
मुख्य अतिथि प्रो. संजय श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में भारतीय दर्शन की वैश्विक महत्ता पर चर्चा करते हुए इसे मानवता के मार्गदर्शन का आधार बताया। उन्होंने युवा शोधार्थियों को नवाचार और समन्वय की दिशा में कार्य करने हेतु प्रेरित किया।
सारस्वत अतिथि प्रो. शशि प्रताप शाही ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि दर्शन समाज में नैतिकता और मूल्यबोध के विकास का प्रमुख साधन है। उन्होंने कहा कि मैं यहां का निवासी हूं और इस अधिवेशन के सफलतापूर्वक संचालन और विश्वविद्यालय विकास हेतु कुलपति की प्रशंसा की।
सारस्वत अतिथि प्रो. लक्ष्मी निवास पांडे, ने अपने संबोधन में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और दर्शन के गहरे संबंध को उजागर किया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन की जड़ें हमारी संस्कृति में निहित हैं और इसका संरक्षण एवं संवर्धन अत्यंत आवश्यक है।
प्रथम संगोष्ठी का विषय “जय प्रकाश नारायण का समाज दर्शन” था। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. श्रीकांत मिश्र ने की, जबकि समन्वयक के रूप में डॉ. शैलेंद्र कुमार ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगोष्ठी में वक्ताओं ने जय प्रकाश नारायण के समाजवादी दृष्टिकोण, संपूर्ण क्रांति की अवधारणा तथा समकालीन सामाजिक संदर्भों में उनके विचारों की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए।
द्वितीय संगोष्ठी का विषय “पंडित रामवतार शर्मा के दार्शनिक चिंतन के विविध आयाम” था। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. श्यामल किशोर ने की तथा समन्वयक के रूप में डॉ. स्वस्तिका दास ने आयोजन का सफल संचालन किया। इस सत्र में विद्वानों ने पंडित रामवतार शर्मा के दार्शनिक दृष्टिकोण, भारतीय दर्शन के क्षेत्र में उनके योगदान तथा भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ उनके चिंतन के अंतर्संबंधों पर गहन विमर्श किया।
