तर्कपूर्ण संवाद व विविध विभागीय पत्र वाचन को शोधार्थियों ने किया प्रस्तुत
जीवंत अकादमिक वातावरण बनाने में शोधार्थियों की भूमिका सराहनीय रही
जेपीयू में चल रहे अखिल भारतीय दर्शन परिषद का दूसरा दिन सम्पन्न
छपरा:अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें अधिवेशन का द्वितीय दिवस गहन दार्शनिक विमर्श,तर्कपूर्ण संवाद और विविध विभागीय पत्र-वाचन सत्रों के साथ अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ ।
जय प्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेई ने अपने प्रेरणादायी शुभकामना संदेश में कहा कि दर्शन केवल सैद्धांतिक चिंतन का विषय नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक आयाम व्यक्तिगत, सामाजिक और आध्यात्मिक को दिशा प्रदान करने वाली एक सजीव प्रक्रिया है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, जहाँ मानवता अनेक नैतिक, बौद्धिक और अस्तित्वगत संकटों से जूझ रही है, वहाँ दर्शन शास्त्र का पुनर्स्मरण और उसका व्यवहारिक अनुप्रयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है। उन्होंने सभी प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि इस प्रकार के अधिवेशन ज्ञान की परंपरा को सुदृढ़ करने के साथ-साथ नवाचारपूर्ण चिंतन को भी प्रेरित करते हैं।
द्वितीय दिवस के अंतर्गत आयोजित विभिन्न सत्रों में दर्शन के प्रमुख आयामों—तर्क, ज्ञान, नैतिकता, धर्म, तत्व, समाज एवं चेतना—पर गहन और बहुआयामी विचार-विमर्श हुआ। प्रत्येक सत्र में प्रस्तुत शोध-पत्रों ने न केवल पारंपरिक दार्शनिक अवधारणाओं की पुनर्व्याख्या की, बल्कि समकालीन संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता को भी स्थापित किया।
तर्क एवं ज्ञान मीमांसा सत्र में ज्ञान के स्रोतों, प्रमाणों की वैधता, सत्य की प्रकृति तथा तर्क की संरचना पर सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किए गए।
अध्यक्ष प्रो. राजेश तिवारी ने अपने संबोधन में कहा कि तर्क और ज्ञान मीमांसा वह आधार है, जिसके बिना किसी भी प्रकार का दार्शनिक या वैज्ञानिक चिंतन संभव नहीं है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द जैसे प्रमाण न केवल बौद्धिक जिज्ञासा को संतुष्ट करते हैं, बल्कि सत्य की खोज को भी व्यवस्थित रूप प्रदान करते हैं।
नीति दर्शन सत्र में नैतिकता, कर्तव्य, मूल्य एवं आचरण के प्रश्नों पर समकालीन दृष्टिकोण से विचार किया गया।
अध्यक्ष प्रो. श्रीकांत मिश्र ने कहा कि आज के युग में जब भौतिक प्रगति के साथ नैतिक संकट भी गहराता जा रहा है, तब नीति दर्शन मानव जीवन में संतुलन स्थापित करने का कार्य करता है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि नैतिकता केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना है।
धर्म मीमांसा सत्र में धर्म की दार्शनिक व्याख्या, उसकी विविध परंपराओं तथा आधुनिक जीवन में उसकी भूमिका पर विमर्श हुआ।
अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप संकीर्णता में नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय मूल्यों में निहित है। उन्होंने धर्म को आंतरिक अनुशासन, सह-अस्तित्व और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बताया।
तत्व मीमांसा सत्र में अस्तित्व, ब्रह्मांड, आत्मा और परम सत्य जैसे गूढ़ विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए।अध्यक्ष प्रो. अभय कुमार सिंह ने कहा कि तत्व मीमांसा मानव की उस जिज्ञासा का परिणाम है, जो ‘मैं कौन हूँ’ और ‘यह जगत क्या है’ जैसे मूल प्रश्नों से उत्पन्न होती है। उन्होंने यह भी कहा कि तत्व मीमांसा केवल दार्शनिक चिंतन नहीं, बल्कि आत्म-बोध की यात्रा है।
समाज दर्शन सत्र में सामाजिक संरचना, न्याय, समानता, स्वतंत्रता एवं समकालीन सामाजिक परिवर्तन जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
अध्यक्ष डॉ. ईश्वरचंद्र खगड़िया ने कहा कि समाज दर्शन का उद्देश्य केवल समाज का विश्लेषण करना नहीं, बल्कि उसे अधिक न्यायपूर्ण और समतामूलक बनाना भी है। उन्होंने वर्तमान सामाजिक चुनौतियों के समाधान में दार्शनिक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया।
योग एवं मानव चेतना सत्र में योग के माध्यम से मानसिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक संतुलन पर विचार किया गया। अध्यक्ष डॉ. सुशील कुमार सिंह ने कहा कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि चेतना के उच्चतर स्तर तक पहुँचने का एक सशक्त साधन है। उन्होंने यह भी कहा कि योग के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की शांति, संतुलन और आत्मबोध को प्राप्त कर सकता है।
द्वितीय दिवस के सायंकाल में सांस्कृतिक कार्यकम में बिहार की संस्कृति ने भारत के विभिन्न स्थानों से आए प्रतिभागियों को मंत्रमुग्ध किया। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम वैकुंठ टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किया गया।
सभी सत्रों व कार्यक्रमों में विद्वानों एवं शोधार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही, जिससे एक जीवंत अकादमिक वातावरण का निर्माण हुआ।
