ढाई शताब्दियों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम, नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
खगड़िया। वरिष्ठ संवाददाता दीपक कुमार।
खगड़िया के संसारपुर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापना और पूजा-अर्चना की परंपरा करीब 251 वर्षों से चली आ रही है। ढाई शताब्दियों से अधिक समय से जारी यह परंपरा आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ कायम है। शारदीय नवरात्र के मौके पर यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना होती है। यह आयोजन संसारपुर दुर्गा पूजा समिति की देखरेख में संपन्न होता है।
251 वर्षों से नहीं टूटी परंपरा
संसारपुर की दुर्गा पूजा क्षेत्र की पुरानी धार्मिक परंपराओं में शामिल है। बताया जाता है कि करीब 251 वर्ष पूर्व मूर्ति कलाकार बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर यहां स्थापित की थी। पूजा के दौरान श्रद्धालुओं ने पूरी आस्था के साथ मां से मनोकामना मांगी, जो पूरी हुई। इसके बाद से यहां प्रतिमा स्थापना और पूजा-अर्चना की परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही।
प्रतिमा विसर्जन से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार, पहली बार जब बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने मां की प्रतिमा स्थापित की थी, तब विसर्जन के समय प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन प्रतिमा अपनी जगह से नहीं उठी। इसके बाद ग्रामीणों ने एकत्र होकर मां से क्षमा याचना की और प्रार्थना की कि हर वर्ष प्रतिमा स्थापित कर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। इसके बाद प्रतिमा विसर्जन के लिए उठाई जा सकी।
पाठा और भैंसा बलि की परंपरा
संसारपुर दुर्गा मंदिर में वर्षों से पाठा और भैंसा बलि दिए जाने की परंपरा भी चली आ रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह पूजा की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान स्थानीय रीति-रिवाज और निर्धारित विधि-विधान का पालन किया जाता है।
स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर बना है मंदिर
संसारपुर दुर्गा मंदिर को स्वर्ण मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर परिसर में महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारों की व्यवस्था की जाती है, ताकि पूजा और दर्शन के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दरबार में मनोकामना मांगने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है। इसी आस्था के कारण नवरात्र के दौरान दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
मूर्ति निर्माण की परंपरा भी जारी
समिति के कार्यकर्ताओं के अनुसार, सर्वप्रथम बंदीलाल मिस्त्री के पूर्वजों ने मां की प्रतिमा स्थापित की थी। आज उनके पुत्र भी वर्षों से प्रतिमा निर्माण का कार्य करते आ रहे हैं। इस तरह प्रतिमा निर्माण और पूजा-अर्चना की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
जितिया के दिन होता है प्राण-प्रतिष्ठा
आयोजकों के अनुसार, यहां जितिया के दिन सभी प्रतिमाओं में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। इस अनुष्ठान का समय पहले से निर्धारित रहता है और पूजा परंपरा के अनुसार इसमें एक सेकंड का भी अंतर नहीं होने दिया जाता।
नवरात्र शुरू होते ही संसारपुर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। मां के जयकारों और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है। 251 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी संसारपुर की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान बनी हुई है।
ढाई शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आस्था, संस्कृति और विरासत की अमूल्य धरोहर बनी रहेगी।
