(हरिप्रसाद शर्मा)/ पुष्कर/ अजमेर/ धार्मिक नगरी पुष्कर में होली के नाम पर प्रस्तावित पार्टियों को लेकर एक बार फिर माहौल गरमा गया है। तीर्थ पुरोहित संघ, पुष्कर ने उपखंड अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट मांग रखी है कि शहर और आसपास के क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की पार्टी को अनुमति न दी जाए। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि प्रशासन अनुमति देता है तो आंदोलन किया जाएगा।
यह कदम निश्चित रूप से धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है। पुष्कर की पहचान सदियों से तीर्थराज के रूप में रही है। विश्वविख्यात ब्रह्मा मंदिर और सरोवर ने इस नगर को केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मानचित्र पर स्थापित किया है। ऐसे में “पुष्कर होली” के नाम से प्रचारित है । जबकि पुष्कर की पौराणिक तीर्थ है, जिसके कारण पार्टियों को लेकर चिंता स्वाभाविक है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक प्रश्न बार-बार उभरता है—क्या आस्था की रक्षा का दायित्व केवल पुरोहित समाज का है?
पुष्कर में अनेक समाज निवास करते हैं। व्यापार, होटल उद्योग, पर्यटन, संपत्ति और स्थानीय राजनीति—हर क्षेत्र में विभिन्न समुदायों की मजबूत भागीदारी है। आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी व्यापक है। फिर जब बात धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक छवि की आती है, तो आवाज़ मुख्यतः पाराशर और ब्राह्मण समाज की ओर से ही क्यों उठती दिखाई देती है?
यह प्रश्न किसी एक समाज पर उंगली उठाने का नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी का है। यदि पुष्कर की छवि पूरे देश में बदल रही है, यदि “तीर्थ” की जगह “पार्टी डेस्टिनेशन” की छवि उभर रही है, तो उसका असर भी पूरे शहर पर पड़ेगा—चाहे वह पुरोहित हो, व्यापारी हो, होटल व्यवसायी हो या आम नागरिक।
संभव है कुछ वर्ग आर्थिक दृष्टि से इसे अवसर के रूप में देखते हों। संभव है कुछ लोग इसे आधुनिक पर्यटन की अनिवार्यता मानते हों। लेकिन क्या इन सबके बीच संतुलन पर खुली चर्चा नहीं होनी चाहिए?
आस्था और अर्थव्यवस्था—दोनों ही समाज के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। प्रश्न यह है कि क्या इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की सामूहिक इच्छा मौजूद है?
यदि विरोध केवल एक समाज तक सीमित रहेगा तो यह सामाजिक मुद्दा नहीं, वर्गीय मुद्दा बनकर रह जाएगा। पर यदि सभी समाज आगे आकर अपनी स्पष्ट राय रखें—चाहे समर्थन में या विरोध में—तो समाधान भी सामूहिक रूप से निकल सकता है।
अंततः यह केवल पार्टी की अनुमति का मामला नहीं है। यह पुष्कर की दीर्घकालिक पहचान, उसकी सांस्कृतिक दिशा और सामाजिक एकता का प्रश्न है।
अब देखना यह है कि यह आवाज़ एक ज्ञापन तक सीमित रहती है या व्यापक सामाजिक संवाद का रूप लेती है।
ज्ञातव्य हो कि पुष्कर मे बाघेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र शास्त्री ने अपनी कथा के दौरान बार बार कहा की पुष्कर में , होटलों, रिसोर्ट में पार्टियॉ नहीं होनी चाहिए
